HC का बड़ा फैसला: DNA रिपोर्ट में पिता नहीं तो भी बेटी को मिलेगा पिता का नाम, जानें क्या है नो-एक्सेस थ्योरी

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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बच्चे की पहचान और उसके सम्मान को लेकर बेहद महत्वपूर्ण फैसला दिया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि शादी के दौरान जन्मे बच्चे के पिता होने पर सिर्फ डीएनए रिपोर्ट के आधार पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।

जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की बेंच ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 की धारा 116 के तहत शादी के दौरान जन्मे बच्चे को लेकर एक मजबूत कानूनी धारणा होती है। इस धारणा को खत्म करने के लिए पति को ठोस सबूत देना होगा कि जब बच्चा पेट में आया, उस वक्त पति-पत्नी के बीच मिलने की कोई गुंजाइश ही नहीं थी।

अगर ऐसा पुख्ता सबूत नहीं है तो बच्चे की पहचान पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अपर्णा अजेंक्य फिरोदिया बनाम अजेंक्य अरुण फिरोदिया और इवान राथिनम बनाम मिलन जोसेफ केस का हवाला भी दिया।

मामला दुर्ग जिले का है। एक शख्स की शादी 5 मई 2005 को हुई थी। 21 सितंबर 2006 को उसकी बेटी का जन्म हुआ। बाद में दोनों पति-पत्नी का 15 नवंबर 2016 को आपसी रजामंदी से तलाक हो गया। गुजारा भत्ता के केस के दौरान डीएनए टेस्ट कराया गया, जिसमें शख्स बच्ची का बायोलॉजिकल पिता नहीं निकला।

इसके बाद उसने फैमिली कोर्ट में केस लगाकर बेटी के स्कूल और सरकारी कागजों से अपना नाम हटाने की मांग की। दुर्ग फैमिली कोर्ट ने 5 अप्रैल 2025 को उसकी मांग को खारिज कर दिया था। इसी आदेश के खिलाफ उसने हाईकोर्ट में अपील की थी।

हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि बच्चों को छोटी-छोटी बातों पर कोर्ट में उनकी पहचान पर सवाल उठाकर परेशान नहीं किया जाना चाहिए। बच्चों को मां-बाप के झगड़े का हथियार नहीं बनाना चाहिए। बच्चे की फैमिली हिस्ट्री उसकी पहचान और उसकी इज्जत से जुड़ी है, जिसे सिर्फ एक डीएनए रिपोर्ट के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता।

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