बकरीद में कुर्बानी के तीन हिस्से और 5 फर्ज, जानिए क्या हैं नियम

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Bakrid Kab hai: ईद अल अजहा को भारतीय उपमहाद्वीप में बकरा ईद और बड़ी ईद भी कहा जाता है। यह मूलतः बालिगों का त्योहार है, क्योंकि इसकी सभी रस्में-रिवायतें घर के बड़े अर्थात जिम्मेदार व्यक्ति द्वारा ही पूरी की जाती हैं। इस साल 28 मई को बकरीद मनाई जाएगी। हज का फर्ज कई नियमों में बंधा होता है, इसलिए कुर्बानी पर भी कई बंदिशें आयद हो जाती है। पहला नियम हज और कुर्बानी पर यह लागू होता है कि पैसा अपनी हलाल की कमाई का हो। इसमें उधार लेन-देन का कोई नियम नहीं है। आपको हज और कुर्बानी अपनी मेहनत की कमाई में करनी है। पहले आपको अपने लालचीपन तथा बेईमानी के स्वभाव की कुर्बानी देनी होगी, तभी आपकी कुर्बानी और हज कुबूल किया जाएगा। हज और कुर्बानी में उधारी नहीं चलती, इसलिए प्रत्येक मुस्लिम न हज कर पाता है और न ही कुर्बानी, लेकिन हज का पर्व और ईद की खुशी तो पूरे समाज के लिए है। इस्लाम बांट कर खाने को तरजीह देता है, इसलिए कुर्बानी के सामान में तीन हिस्से बना दिए गए हैं।

कुर्बानी की तीन हिस्से किसके?

एक जो कुर्बानी करता है उसका। दूसरा गरीब रिश्तेदारों का। तीसरा यतीम, माजोर और मजलूमों का। कहा गया है कि अपने समाज में ऐसे लोगों को तलाश कीजिए और उन तक उनका हक पहुंचाइए। इस्लाम हर अवसर पर नमाज और इबादत को तरजीह देता है। सबसे पहले शहर की ईदगाह और बड़ी मस्जिदों में नमाज अदा की जाती है। उसके बाद कुर्बानी की सुन्नत पूरी की जाती है। जी हां! कुर्बानी हजरत इब्राहिम की सुन्नत की अदायगी है न कि फर्ज।

फर्ज की अदायगी जरूरी, क्या हैं 5 फर्ज

यह समझना जरूरी है कि सुन्नत पूरी करने की बंदिश नहीं है, मगर फर्ज की अदायगी जरूरी हैं। पांच फर्ज हैं- कलमा, नमाज, रमजान, जकात और हज। पहले तीन फर्ज में कोई शर्त नहीं है। यह सभी अमीर-गरीब के लिए है, जिसमें माल-औ-दौलत की जरूरत नहीं होती, लेकिन जकात और हज में कुछ नियम लागू हो जाते हैं। जैसे कि कितनी दौलत हो, तो जकात जरूरी है। इसी प्रकार हज भी कई नियमों के बंधन में किया जाता है। सिर्फ पैसा होने से आप हज के हकदार नहीं हो जाते हैं।

कुर्बानी का आध्यात्मिक पक्ष

कुर्बानी का आध्यात्मिक पक्ष महत्वपूर्ण है। कुर्बानी अपने भीतर के पशुवत आचरण की भी देनी होती है। अपने श्रेष्ठ होने के अहंकार के साथ-साथ अपने धन एवं नस्लीय गर्व की मानसिकता की कुर्बानी भी इसमें शामिल है। हज उन पर फर्ज है, जो अपनी दुनियावी फर्जों को पूरा कर चुके हों। उन पर किसी प्रकार का कर्ज न हो, इसलिए लोग पहले अपने बच्चों को पढ़ाते-लिखाते हैं, उनकी शादी-ब्याह आदि से निबट कर ही हज पर जाते हैं।

ईद अल अजहा का साफ संदेश

अपने समाज के जरूरतमंद लोगों की मदद करना। उनके सुख और खुशी की वजह बनना। आप हज नहीं कर पाते, आप कुर्बानी नहीं कर पाते, कोई बात नहीं। अपनी हैसियत से किसी की मदद करना भी कुर्बानी के जज्बे में शामिल है। आपकी मीठी बोली तथा सहृदय व्यवहार भी इबादत का ही एक रूप है। आप छोटी-छोटी मदद कर, थोड़ी-थोड़ी खुशियां बांटकर भी अपने रब को राजी रख सकते हैं।

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