महासमुंद। छत्तीसगढ़ पुलिस ने महासमुंद LPG गबन कांड में बड़ा खुलासा किया है। पुलिस ने रविवार को जिला खाद्य अधिकारी अजय यादव को पूरे सिंडिकेट का मास्टरमाइंड बताया। मामले में अब तक चार आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जबकि संतोष ठाकुर और सार्थक ठाकुर फरार बताए जा रहे हैं।
इस मामले में दिसंबर 2025 में सिंघोड़ा थाना क्षेत्र में छह एलपीजी गैस से भरे कैप्सूल ट्रक जब्त किए गए थे। कलेक्टर कार्यालय की सुरक्षा निर्देशों के अनुसार इन्हें सुरक्षित स्थान पर रखने का काम खाद्य विभाग को सौंपा गया। इसी दौरान गैस गबन की योजना तैयार की गई।
योजना और क्रियान्वयन
जांच में सामने आया कि 23 मार्च 2026 को आरंग के एक ढाबे में बैठक आयोजित की गई, जिसमें जिला खाद्य अधिकारी अजय यादव, गौरव गैस एजेंसी संचालक पंकज चंद्राकर और अन्य लोग शामिल थे। इसके बाद 26 मार्च को अजय यादव और पंकज चंद्राकर सिंघोड़ा थाने पहुंचे और ट्रकों में भरी गैस का आंकलन किया।
पुलिस के मुताबिक, ट्रकों में लगभग 102-105 मीट्रिक टन एलपीजी गैस भरी थी। उसी रात रायपुर की एजेंसियों और ठाकुर पेट्रोकेमिकल्स के साथ 80 लाख रुपये में सौदा तय किया गया। 30 मार्च को छह ट्रकों को अभनपुर प्लांट में ले जाया गया।
31 मार्च, 1 अप्रैल और 5 अप्रैल की रात ट्रकों से गैस निकाली गई। पुलिस के अनुसार, तीन दिनों में लगभग 92 टन गैस निकालकर विभिन्न निजी टैंकरों और एजेंसियों में ट्रांसफर कर दी गई।
जांच में सामने आए बड़े प्रमाण
- ट्रकों का समय पर वजन नहीं कराया गया, जिससे गैस निकालना आसान हुआ।
- अप्रैल में ठाकुर पेट्रोकेमिकल्स ने केवल 47 टन एलपीजी खरीदी, जबकि 107 टन बिक्री दर्ज की, जिससे लगभग 60 टन गैस की कालाबाजारी उजागर हुई।
- कई रिकॉर्ड और रजिस्टर गायब पाए गए।
पुलिस ने बताया कि आरोपियों ने जांच को भ्रमित करने के लिए समान बयान और साक्ष्य मिटाने की योजना बनाई।
गिरफ्तारी और कार्रवाई
करीब 15 दिनों तक चली 40 सदस्यीय टीम की जांच में कॉल डिटेल, तकनीकी विश्लेषण और दस्तावेजी सबूतों के आधार पर पूरे कांड का खुलासा हुआ।
अधिकारियों ने बताया कि गैस कैप्सूल में कोई लीकेज नहीं था, यानी प्राकृतिक रूप से इतनी बड़ी मात्रा में गैस खत्म होना संभव नहीं था। अब तक गिरफ्तार आरोपियों में शामिल हैं:
- अजय यादव (जिला खाद्य अधिकारी)
- पंकज चंद्राकर (गौरव गैस एजेंसी)
- मनीष चौधरी
- अन्य एक आरोपी
फरार आरोपियों की तलाश जारी है। मामले में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और आवश्यक वस्तु अधिनियम की धाराओं के तहत कार्रवाई की जा रही है।
