सुकमा। कभी जंगलों में बंदूक थामकर माओवादी संगठन के साथ चलने वाली नौ महिलाओं की जिंदगी अब पूरी तरह बदल रही है। हिंसा और बंदूक की राह छोड़कर मुख्यधारा में लौटीं इन आत्मसमर्पित नक्सली महिलाओं ने राजधानी रायपुर में ऐसा कदम रखा, जिसने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के प्रदेश स्तरीय बुनकर सम्मेलन में सुकमा की इन नौ महिलाओं ने पारंपरिक कोसा सिल्क और हैंडलूम परिधानों में रैंपवॉक किया। मंच पर आत्मविश्वास के साथ कदम बढ़ाती महिलाओं को देखकर यह साफ नजर आया कि पुनर्वास और कौशल विकास के जरिए जिंदगी को नई दिशा दी जा सकती है।
बंदूक की जगह हथकरघा, जंगल की जगह मंच
रायपुर के पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में आयोजित कार्यक्रम में इन महिलाओं ने पारंपरिक हथकरघा वस्त्र पहनकर रैंपवॉक किया।
यह पल इसलिए भी खास रहा क्योंकि इन महिलाओं ने कभी माओवादी हिंसा का रास्ता अपनाया था। अब वही महिलाएं समाज की मुख्यधारा में लौटकर अपने हुनर और आत्मविश्वास के साथ नई पहचान बनाने की कोशिश कर रही हैं।
रैंप पर उनके चेहरे की मुस्कान और आत्मविश्वास ने उनके बदले जीवन की कहानी बयां की।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने बढ़ाया हौसला
कार्यक्रम में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय भी मौजूद रहे। उन्होंने आत्मसमर्पित महिलाओं से आत्मीय संवाद किया और मुख्यधारा में लौटने के उनके फैसले की सराहना की।
मुख्यमंत्री ने उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए उनका मनोबल बढ़ाया। पहली बार राजधानी रायपुर पहुंचीं इन महिलाओं के लिए मुख्यमंत्री से मुलाकात और इतने बड़े मंच पर प्रस्तुति देना यादगार अनुभव रहा।
सरकार की ओर से संचालित कौशल विकास और पुनर्वास से जुड़ी पहल का उद्देश्य आत्मसमर्पित लोगों को सम्मानजनक जीवन और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना है।
सात दिन की ट्रेनिंग ने बदला आत्मविश्वास
रैंपवॉक से पहले इन महिलाओं को विशेष प्रशिक्षण दिया गया। मुंबई से आए पेशेवर विशेषज्ञों ने लगातार सात दिनों तक उन्हें रैंपवॉक, ग्रूमिंग, वेशभूषा और मंच पर अपनी बात रखने का प्रशिक्षण दिया।
शुरुआत में झिझक और संकोच के बावजूद महिलाओं ने प्रशिक्षण के दौरान लगातार अभ्यास किया। धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास बढ़ता गया और आखिरकार वे बड़े मंच पर पूरे आत्मविश्वास के साथ रैंप पर उतरीं।
प्रशिक्षण में शामिल रहे प्रमुख पहलू
- रैंपवॉक और मंच पर चलने का प्रशिक्षण
- पारंपरिक हथकरघा परिधानों की प्रस्तुति
- ग्रूमिंग और व्यक्तित्व विकास
- माइक पर बेझिझक बोलने का अभ्यास
- सार्वजनिक मंच पर आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुति
पुनर्वास नीति का दिखा मानवीय असर
इन महिलाओं की कहानी केवल एक फैशन शो या रैंपवॉक तक सीमित नहीं है। यह उन प्रयासों की तस्वीर भी पेश करती है, जिनके जरिए आत्मसमर्पण करने वाले लोगों को हिंसा की दुनिया से निकालकर सामान्य जीवन की ओर लौटने का अवसर दिया जा रहा है।
कौशल विकास के माध्यम से महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश की जा रही है। इससे उनके लिए रोजगार और सम्मानजनक जीवन के नए रास्ते खुल रहे हैं।
हथकरघा बना नई पहचान का जरिया
कार्यक्रम में महिलाओं ने छत्तीसगढ़ की पारंपरिक कोसा सिल्क और हैंडलूम परिधानों को पहनकर प्रदेश की हथकरघा विरासत को भी प्रदर्शित किया।
इस प्रस्तुति ने दो तस्वीरों को एक साथ सामने रखा—एक ओर अतीत की हिंसा और दूसरी ओर वर्तमान का आत्मविश्वास। महिलाओं ने दिखाया कि सही अवसर और सहयोग मिलने पर जीवन की दिशा बदली जा सकती है।
बदलते बस्तर की तस्वीर
सुकमा और बस्तर लंबे समय तक नक्सल हिंसा के कारण देशभर में चर्चा में रहे हैं। ऐसे में आत्मसमर्पण के बाद इन महिलाओं का कौशल विकास और सार्वजनिक मंच पर प्रस्तुति देना बदलते बस्तर की एक अलग तस्वीर सामने लाता है।
कभी जिन कदमों का रास्ता जंगलों और हिंसा की ओर मुड़ गया था, वही कदम अब मंच पर हथकरघा परिधानों के साथ आगे बढ़ रहे हैं। यह बदलाव उनके व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ पुनर्वास और मुख्यधारा से जुड़ने की संभावनाओं को भी दर्शाता है।
इन नौ महिलाओं की रैंपवॉक ने यह संदेश दिया कि आत्मसमर्पण के बाद सम्मानजनक जीवन की शुरुआत संभव है। बंदूक छोड़कर हुनर को अपनाने की यह कहानी उन लोगों के लिए भी उम्मीद की किरण बन सकती है, जो हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटना चाहते हैं।
