भारतीय शेयर बाजार में गुरुवार को भारी बिकवाली ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी। कारोबार के दौरान सेंसेक्स और निफ्टी में 1.5 फीसदी से ज्यादा की गिरावट दर्ज की गई। बाजार में आई इस कमजोरी के कारण बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों के कुल बाजार पूंजीकरण से करीब 11 लाख करोड़ रुपये कम हो गए। इससे निवेशकों की संपत्ति को बड़ा झटका लगा।
बाजार में गिरावट के पीछे कई अहम कारण सामने आए हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की सख्त मौद्रिक नीति, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की लगातार बिकवाली, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में उछाल और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने बाजार का माहौल कमजोर किया। इसके साथ ही अमेरिका में ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता ने भी निवेशकों को सतर्क कर दिया।
सेंसेक्स और निफ्टी में बड़ी गिरावट
गुरुवार को कारोबार के दौरान शेयर बाजार में बिकवाली का दबाव बढ़ता गया। सेंसेक्स 1,200 से ज्यादा अंक गिरकर 71,400 के स्तर से नीचे चला गया। वहीं, निफ्टी 50 फिसलकर 22,179 के स्तर तक पहुंच गया, जो दिए गए बाजार विवरण के अनुसार 52 सप्ताह का नया निचला स्तर था।
कारोबार समाप्त होने पर भी बाजार संभल नहीं सका।
- सेंसेक्स: 1,045.46 अंक गिरकर 71,593.24 पर बंद हुआ।
- निफ्टी 50: 371.25 अंक टूटकर 22,231.80 पर बंद हुआ।
- निवेशकों की संपत्ति: बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों के कुल बाजार पूंजीकरण में लगभग 11 लाख करोड़ रुपये की कमी आई।
- बाजार की स्थिति: प्रमुख सूचकांकों में तेज गिरावट से निवेशकों की धारणा कमजोर हुई।
आखिर बाजार में इतनी बड़ी गिरावट क्यों आई? इसके पीछे पांच प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।
1. RBI की सख्त नीति से बढ़ी चिंता
भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति बाजार के लिए अहम संकेत देती है। ब्याज दरों में बढ़ोतरी से कंपनियों के लिए कर्ज लेना महंगा हो सकता है। इससे कारोबार के विस्तार और मुनाफे पर असर पड़ने की आशंका रहती है।
दिए गए विवरण के मुताबिक, RBI ने करीब चार साल बाद पहली बार ब्याज दर बढ़ाई और अपनी नीति का रुख ‘न्यूट्रल’ से बदलकर ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ कर दिया।
इस बदलाव से निवेशकों को आशंका हो सकती है कि आने वाले समय में ब्याज दरें ऊंची बनी रहेंगी। ऐसी स्थिति में कंपनियों की लागत बढ़ सकती है और शेयरों के मूल्यांकन पर दबाव आ सकता है।
जेफरीज को मौजूदा चक्र में लगभग 100 बेसिस पॉइंट तक और बढ़ोतरी की उम्मीद बताई गई है। हालांकि, यह विश्लेषकों का अनुमान है, RBI का घोषित भविष्य का फैसला नहीं।
2. अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में उछाल
अमेरिका में सरकारी बॉन्ड की यील्ड बढ़ने से भी भारतीय शेयर बाजार प्रभावित हुआ। जब सुरक्षित माने जाने वाले निवेश विकल्पों से बेहतर रिटर्न मिलने की संभावना बढ़ती है, तो कुछ निवेशक शेयरों से पैसा निकालकर बॉन्ड की ओर रुख कर सकते हैं।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार:
- अमेरिका के 30 साल के बॉन्ड की यील्ड 5.71 फीसदी से ऊपर पहुंच गई।
- 10 साल के बॉन्ड की यील्ड 5.3 फीसदी से अधिक रही।
- दो साल के बॉन्ड की यील्ड करीब 4.9 फीसदी तक पहुंच गई।
बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी से इक्विटी बाजार पर दबाव बढ़ सकता है। इसका असर खासकर उन बाजारों पर पड़ सकता है, जहां विदेशी निवेशकों की भागीदारी अधिक है।
3. ब्रेंट क्रूड 102 डॉलर के पार
मिडिल ईस्ट में तनाव और समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिम के कारण कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। दिए गए बाजार विवरण के मुताबिक, ब्रेंट क्रूड की कीमत 102 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई।
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। इसलिए तेल की कीमतों में तेजी का असर अर्थव्यवस्था और कंपनियों की लागत पर पड़ सकता है।
महंगे कच्चे तेल से कई चुनौतियां पैदा हो सकती हैं:
- परिवहन और उत्पादन की लागत बढ़ सकती है।
- महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है।
- तेल आयात के लिए अधिक विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ सकती है।
- रुपये और देश के चालू खाते पर दबाव बढ़ने की आशंका रह सकती है।
इसी वजह से कच्चे तेल की कीमतों में तेजी को भारतीय शेयर बाजार के लिए जोखिम माना जाता है।
4. FII की लगातार बिकवाली ने बढ़ाया दबाव
विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी FII की बिकवाली बाजार में गिरावट की एक बड़ी वजह रही। जब विदेशी निवेशक बड़ी मात्रा में शेयर बेचते हैं, तो बाजार में खरीदारी के मुकाबले बिकवाली का दबाव बढ़ सकता है।
दिए गए NSE आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी निवेशकों ने बुधवार को 6,121 करोड़ रुपये से अधिक के भारतीय शेयर बेचे। लगातार नौ कारोबारी सत्रों में उनकी कुल बिकवाली लगभग 57,000 करोड़ रुपये बताई गई है।
सितंबर की शुरुआत से अब तक 25 में से 20 कारोबारी सत्रों में विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयरों के शुद्ध विक्रेता रहे।
विदेशी निवेशकों के फैसलों पर अमेरिकी ब्याज दरें, डॉलर की मजबूती, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां और दूसरे बाजारों में मिलने वाले रिटर्न का असर पड़ सकता है। उनकी लगातार बिकवाली से बाजार में निवेशकों का भरोसा कमजोर हो सकता है।
5. अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों पर नजर
अमेरिकी फेडरल रिजर्व के अगले फैसले को लेकर भी बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है। अमेरिका में ब्याज दरें ऊंची रहने से डॉलर आधारित निवेश आकर्षक हो सकते हैं। इससे उभरते बाजारों में विदेशी पूंजी के प्रवाह पर असर पड़ सकता है।
दिए गए CME FedWatch आंकड़ों के अनुसार, ट्रेडर्स ने इस महीने ब्याज दर बढ़ने की संभावना 18 फीसदी और दिसंबर में बढ़ोतरी की संभावना करीब 80 फीसदी आंकी थी। ये बाजार की संभावनाओं के अनुमान हैं, फेडरल रिजर्व के आधिकारिक फैसले नहीं।
इसलिए निवेशक अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों और केंद्रीय बैंक के संकेतों पर बारीकी से नजर रख रहे हैं।
अब आगे शेयर बाजार का क्या होगा?
आने वाले कारोबारी सत्रों में बाजार की दिशा कई कारकों पर निर्भर करेगी। इनमें विदेशी निवेशकों की खरीदारी, कच्चे तेल की कीमतें, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, RBI की नीति और कंपनियों के वित्तीय नतीजे शामिल हैं।
निवेशकों को इन बातों पर ध्यान देना चाहिए:
- बाजार में गिरावट के बाद स्थिरता के संकेत मिलते हैं या नहीं।
- विदेशी निवेशकों की बिकवाली कम होती है या जारी रहती है।
- कच्चे तेल की कीमतों में राहत मिलती है या तेजी बनी रहती है।
- वैश्विक ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता कम होती है या नहीं।
- कंपनियों की कमाई और कारोबार की संभावनाएं कैसी रहती हैं।
निवेशकों के लिए जरूरी सलाह: बाजार में तेज गिरावट देखकर घबराहट में शेयर बेचना या बिना जांच के खरीदारी करना जोखिम भरा हो सकता है। निवेश का फैसला अपनी जोखिम क्षमता, निवेश की अवधि और कंपनी की वित्तीय स्थिति को ध्यान में रखकर करें।
कुल मिलाकर, RBI की सख्त नीति, FII की बिकवाली, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में उछाल और महंगे कच्चे तेल ने बाजार पर एक साथ दबाव बनाया है। अब निवेशकों की नजर इस बात पर रहेगी कि इन परिस्थितियों में कब राहत मिलती है और बाजार में खरीदारी का भरोसा कब लौटता है।
