नई दिल्ली, दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को राजधानी में एलपीजी सिलेंडर की कमी और कालाबाजारी के आरोपों को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि गैस सप्लाई जैसे मामलों में आदेश देना न्यायपालिका के दायरे में नहीं आता, यह कार्यपालिका का विषय है।
बार एंड बेंच में छपी रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेदस कारिया की पीठ ने कहा कि अदालत ऐसे आदेश जारी नहीं कर सकती जो व्यवहारिक रूप से लागू ही न हो सकें। कोर्ट ने टिप्पणी की कि “अगर हम यह कहें कि अब कालाबाजारी या जमाखोरी नहीं होगी, तो क्या यह संभव है?”
‘गरीबी खत्म करने’ जैसा आदेश नहीं दे सकते
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस तरह का निर्देश देना वैसा ही होगा जैसे सरकार को दो महीने में गरीबी खत्म करने का आदेश देना। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार या तेल कंपनियों की जिम्मेदारी संसाधनों पर निर्भर करती है और अदालत इस तरह के गैर-कार्यान्वयन योग्य आदेश नहीं दे सकती।
याचिकाकर्ता ने क्या कहा
याचिका दाखिल करने वाले अधिवक्ता राकेश कुमार मित्तल ने दावा किया कि बाजार में एलपीजी सिलेंडर की कीमत करीब 1000 रुपये होने के बावजूद कालाबाजारी में इसे 5000 रुपये से अधिक में बेचा जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ समय पहले हाई कोर्ट की कैंटीन में भी गैस की कमी हो गई थी और सरकार देश में कमी के बावजूद गैस का निर्यात कर रही है।
सरकार की कार्रवाई पर कोर्ट संतुष्ट
इस पर अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट कैंटीन में गैस सप्लाई उसी दिन बहाल कर दी गई थी। जस्टिस तेजस कारिया ने कहा कि जब सरकार पहले से ही स्थिति सुधारने के लिए कदम उठा रही है, तो अदालत को हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं है। गैस निर्यात के मुद्दे पर भी अदालत ने साफ किया कि वह सरकार की आर्थिक नीतियों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। यह पूरी तरह कार्यपालिका का क्षेत्र है।
सरकार के पास जाने की सलाह
अंत में अदालत ने याचिकाकर्ता को अपनी शिकायत सरकार के समक्ष रखने की अनुमति दे दी। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मामलों में समाधान निकालना पूरी तरह कार्यपालिका की जिम्मेदारी है और सरकार ही उचित निर्णय ले सकती है।
