दुनिया तेजी से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI की ओर बढ़ रही है। ऑफिसों से लेकर घरों तक अब AI आधारित टूल्स का इस्तेमाल सामान्य होता जा रहा है। लोग चैटबॉट्स से सवाल पूछ रहे हैं, AI की मदद से तस्वीरें और वीडियो बना रहे हैं, कोडिंग कर रहे हैं और कई जटिल काम मिनटों में पूरे कर रहे हैं। लेकिन इस डिजिटल क्रांति के पीछे एक ऐसा पर्यावरणीय संकट छिपा है, जो आने वाले वर्षों में दुनिया के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।
संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी संस्थाओं की एक नई रिपोर्ट ने AI और डेटा सेंटर्स की बढ़ती संसाधन खपत को लेकर बड़ी चेतावनी दी है। रिपोर्ट के अनुसार यदि AI तकनीकों का विस्तार इसी गति से जारी रहा, तो साल 2030 तक दुनिया भर के डेटा सेंटर्स में पानी की खपत इतनी अधिक हो सकती है, जितनी लगभग 130 करोड़ लोगों की सालभर की घरेलू जरूरत होती है।
आखिर AI को इतनी बड़ी मात्रा में पानी की जरूरत क्यों पड़ती है
सामान्य तौर पर लोगों को लगता है कि AI केवल इंटरनेट पर चलने वाला डिजिटल सॉफ्टवेयर है, जिसका प्राकृतिक संसाधनों से कोई सीधा संबंध नहीं होता। लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। AI सिस्टम को संचालित करने के लिए विशाल डेटा सेंटर्स बनाए जाते हैं, जिनमें हजारों-लाखों हाई-पावर सर्वर लगातार काम करते रहते हैं। ये सर्वर लगातार भारी मात्रा में डेटा प्रोसेस करते हैं, जिससे अत्यधिक गर्मी पैदा होती है। इस गर्मी को नियंत्रित करने के लिए विशेष कूलिंग सिस्टम लगाए जाते हैं और इन्हें चलाने में बड़ी मात्रा में पानी का उपयोग होता है। तकनीकी विशेषज्ञ इसे AI की “हिडन कॉस्ट” यानी छिपी हुई कीमत बता रहे हैं।
2030 तक 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी खपत का अनुमान
United Nations से जुड़ी संस्था UNU-INWEH की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2030 तक वैश्विक डेटा सेंटर्स का कुल जल उपयोग बढ़कर करीब 9.3 ट्रिलियन लीटर तक पहुंच सकता है। यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि इससे अफ्रीका महाद्वीप के लगभग 130 करोड़ लोगों की सालभर की घरेलू पानी जरूरत पूरी की जा सकती है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जब कोई व्यक्ति AI चैटबॉट पर एक सामान्य टेक्स्ट प्रॉम्प्ट भेजता है, तो उसके पीछे औसतन लगभग 29 मिलीलीटर पानी की खपत जुड़ी होती है। एक व्यक्ति के स्तर पर यह मात्रा बेहद कम दिखाई देती है, लेकिन दुनिया भर में हर दिन अरबों AI रिक्वेस्ट होने के कारण कुल खपत विशाल स्तर तक पहुंच जाती है।
AI वीडियो और इमेज बनाना ज्यादा संसाधन खपत वाला काम
विशेषज्ञों का कहना है कि AI के जरिए हाई-क्वालिटी वीडियो और इमेज तैयार करना साधारण टेक्स्ट चैट की तुलना में कहीं अधिक संसाधन खर्च करता है। AI वीडियो जेनरेशन में भारी ग्राफिक्स प्रोसेसिंग और हाई-एंड कंप्यूटिंग पावर की जरूरत होती है, जिससे सर्वर और अधिक गर्म होते हैं। इसी वजह से डेटा सेंटर्स को अतिरिक्त कूलिंग की आवश्यकता पड़ती है और पानी की खपत कई गुना तक बढ़ जाती है। यही कारण है कि AI वीडियो टूल्स और इमेज जेनरेटर को भविष्य में पर्यावरणीय दबाव बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों में शामिल माना जा रहा है।
बिजली संकट की भी बढ़ रही आशंका
रिपोर्ट में सिर्फ पानी ही नहीं बल्कि बिजली खपत को लेकर भी गंभीर चिंता जताई गई है। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक दुनिया भर के डेटा सेंटर्स करीब 945 टेरावाट-घंटे बिजली का उपयोग कर सकते हैं। यह मात्रा कई देशों की कुल वार्षिक बिजली खपत से भी अधिक मानी जा रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि डेटा सेंटर्स के लिए नवीकरणीय ऊर्जा, बेहतर कूलिंग तकनीक और पर्यावरण-अनुकूल सिस्टम विकसित नहीं किए गए, तो भविष्य में जल और ऊर्जा संसाधनों पर भारी दबाव पड़ सकता है। AI तकनीक आज दुनिया की अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, मीडिया और उद्योगों का बड़ा हिस्सा बनती जा रही है। लेकिन इसके साथ यह सवाल भी तेजी से उठ रहा है कि क्या दुनिया इस तकनीकी विस्तार की पर्यावरणीय कीमत चुकाने के लिए तैयार है। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले वर्षों में सरकारों और टेक कंपनियों को ऐसे डेटा सेंटर्स विकसित करने होंगे जो कम पानी और कम बिजली की खपत करें। अन्यथा डिजिटल विकास की यह रफ्तार प्राकृतिक संसाधनों पर अभूतपूर्व दबाव पैदा कर सकती है।
