Cancer AI Study: क्या चेहरे की सेल्फी से पता चलेगा कैंसर मरीज के बचने का चांस? नई AI रिसर्च ने बढ़ाई उम्मीद

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नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में तेजी से नई संभावनाएं खोल रहा है। अब वैज्ञानिकों ने एक ऐसा AI मॉडल विकसित किया है, जो चेहरे की तस्वीर का विश्लेषण करके व्यक्ति की जैविक उम्र और कैंसर मरीजों में मृत्यु के जोखिम से जुड़े संकेत पहचान सकता है। इस तकनीक से भविष्य में डॉक्टरों को मरीज की स्थिति का आकलन करने में अतिरिक्त मदद मिल सकती है। हालांकि, फिलहाल इसे कैंसर की जांच या इलाज का विकल्प नहीं माना जा सकता।

अमेरिका के Mass General Brigham के शोधकर्ताओं ने FAHR-Face नाम का AI मॉडल तैयार किया है। इस रिसर्च के नतीजे मेडिकल जर्नल The Lancet Digital Health में प्रकाशित हुए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इस मॉडल को चार करोड़ से अधिक चेहरे की तस्वीरों से प्रशिक्षित किया गया है। इसके आधार पर FAHR-FaceAge और FAHR-FaceSurvival नाम के दो टूल विकसित किए गए हैं।

कैसे काम करता है FAHR-Face AI मॉडल?

यह AI मॉडल चेहरे की तस्वीर में मौजूद कुछ पैटर्न का विश्लेषण करता है। इसका उद्देश्य चेहरे से जैविक उम्र का अनुमान लगाना और कैंसर मरीजों में जीवित रहने से जुड़े जोखिम के संकेतों को समझना है।

इस तकनीक के दो प्रमुख टूल हैं:

  • FAHR-FaceAge: चेहरे की तस्वीर के आधार पर व्यक्ति की जैविक उम्र का अनुमान लगाता है।
  • FAHR-FaceSurvival: कैंसर मरीजों में जीवित रहने से जुड़े जोखिम का आकलन करने के लिए विकसित किया गया है।

जैविक उम्र का मतलब शरीर की स्थिति और उम्र बढ़ने से जुड़े संकेतों से है। यह वास्तविक उम्र से अलग हो सकती है। हालांकि, चेहरे से लगाया गया अनुमान व्यक्ति की संपूर्ण स्वास्थ्य स्थिति का प्रमाण नहीं होता।

चेहरे के किन हिस्सों का विश्लेषण करता है AI?

रिसर्च के अनुसार, दोनों टूल चेहरे के अलग-अलग हिस्सों से संकेत लेते हैं। FAHR-FaceAge माथे, कनपटी और नाक से मुंह तक जाने वाली लकीरों जैसे क्षेत्रों का विश्लेषण करता है। वहीं, FAHR-FaceSurvival आंखों के नीचे और नाक के ऊपरी हिस्से के आसपास के क्षेत्रों पर अधिक ध्यान देता है।

इन हिस्सों से मिलने वाले पैटर्न के आधार पर मॉडल कुछ ऐसे संकेत पहचान सकता है, जिनका संबंध जैविक उम्र और स्वास्थ्य परिणामों से हो सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि चेहरे के किसी खास हिस्से में बदलाव होने से कैंसर या मृत्यु का खतरा निश्चित रूप से साबित हो जाता है।

स्टडी में सामने आए मृत्यु के जोखिम से जुड़े संकेत

शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने अनुमानित जैविक उम्र और कैंसर मरीजों के स्वास्थ्य परिणामों के बीच संबंध का अध्ययन किया। रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, जिन मरीजों की अनुमानित जैविक उम्र उनकी वास्तविक उम्र से कम से कम पांच साल अधिक थी, उनमें लगभग चार साल के फॉलो-अप के दौरान मृत्यु का जोखिम 21 प्रतिशत अधिक पाया गया।

इसके उलट, जिन मरीजों की अनुमानित जैविक उम्र उनकी वास्तविक उम्र से कम से कम पांच साल कम थी, उनमें मृत्यु का जोखिम 17 प्रतिशत कम पाया गया।

इन आंकड़ों को समझना जरूरी है। ये समूहों के बीच देखे गए जोखिम के अंतर को दर्शाते हैं। इनका मतलब यह नहीं है कि किसी खास मरीज के बचने की संभावना निश्चित रूप से 21 प्रतिशत घट जाएगी या 17 प्रतिशत बढ़ जाएगी। किसी व्यक्ति का वास्तविक जोखिम उसकी बीमारी और अन्य मेडिकल परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

क्या डॉक्टर इलाज के फैसलों में इसका इस्तेमाल कर सकेंगे?

भविष्य में ऐसी AI तकनीक डॉक्टरों को मरीज की स्थिति का अतिरिक्त आकलन करने में सहायता दे सकती है। इससे जोखिम से जुड़े संकेतों को समझने और मरीजों की निगरानी की रणनीति बनाने में मदद मिलने की संभावना है।

हालांकि, कैंसर के इलाज का निर्णय कई महत्वपूर्ण बातों पर निर्भर करता है, जैसे:

  • कैंसर का प्रकार और स्टेज।
  • मरीज की उम्र और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं।
  • मेडिकल हिस्ट्री और जांच रिपोर्ट।
  • इलाज के प्रति मरीज की प्रतिक्रिया।
  • डॉक्टरों का क्लिनिकल आकलन।

इसलिए केवल चेहरे की तस्वीर के आधार पर इलाज तय करना उचित नहीं होगा। इस मॉडल की उपयोगिता और सटीकता को अलग-अलग मरीजों और परिस्थितियों में परखने के लिए आगे भी शोध की जरूरत है।

क्या सेल्फी से कैंसर का पता लगाया जा सकता है?

फिलहाल इसका जवाब है—नहीं, सिर्फ सेल्फी से कैंसर होने या मरीज के बचने की निश्चित भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। FAHR-Face को कैंसर की पुष्टि करने वाले टेस्ट के रूप में नहीं, बल्कि स्वास्थ्य परिणामों से जुड़े संभावित संकेतों का विश्लेषण करने वाली तकनीक के रूप में समझना चाहिए।

यह रिसर्च AI और चिकित्सा के बीच बढ़ते सहयोग की एक दिलचस्प मिसाल है। आने वाले समय में अधिक अध्ययन सफल होते हैं, तो ऐसी तकनीक डॉक्टरों के लिए उपयोगी सहायक उपकरण बन सकती है। लेकिन अभी मरीजों को इसके आधार पर इलाज में बदलाव नहीं करना चाहिए और किसी भी स्वास्थ्य संबंधी चिंता के लिए योग्य डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।

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