देर तक सोने वालों को आलसी कहना बंद करें! स्लीप शेमिंग क्यों है गलत और पूरी नींद क्यों है जरूरी

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भारत में देर तक सोने वाले लोगों को आलसी, जल्दी उठो, रात में क्या कर रहे थे, इतनी देर तक सोने से पाप चढ़ता है- जैसी बातों को सुनना पड़ता है। कई लोगों के घरों पर किसी को जगाने के लिए पंखा बंद कर देना, लाइट जला देना या फिर तेज आवाज में काम या बात करना भी किया जाता है। अगर आप भी इस समस्या से परेशान है, तो ये आर्टिकल परिवारवालों को जरूर भेजें। ऑर्थोपैडिक सर्जन डॉक्टर मनन वोरा का कहना है कि स्लीप शेमिंग यानी सोने के लिए किसी को शर्मिंदा करना सबसे बड़ी गलती होती है। चलिए आपको विस्तान से बताते हैं आखिर स्लीप शेमिंग क्या है और क्यों देर तक सोना जरूरी होता है।

क्या होता है स्लीप शेमिंग?

मुंबई के ऑर्थोपेडिक सर्जन, हेल्थ एजुकेटर और न्यूट्रीबाइट वेलनेस के को-फाउंडर डॉ. मनन वोरा ने इंस्टाग्राम पर शेयर किए वीडियो में बताया कि भारतीय घरों में अनुशासन को देखते हुए लोगों को सुबह ही नींद से जगाने की आदत होती है। स्लीप शेमिंग उसे कहा जाता है, जब आप देर तक सो रहे हो और उसके लिए आपको ताने मिले या फिर जगाने के लिए फालतू की चीजें की जाए। हमेशा से भारतीय घरों में कहा जाता है कि सुबह जल्दी उठना चाहिए और यही सेहत के लिए सही है लेकिन अगर आप देर रात तक काम कर रहे हो तो सुबह देर तक सोना भी जरूरी है। ऐसा करने पर आप आलसी नहीं हो सकते।

कितने घंटे की नींद होती है जरूरी

सोना सिर्फ नींद पूरी करने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि इस दौरान दिमाग और शरीर खुद को रिपेयर करते हैं। व्यक्ति को करीब 6-8 घंटे की नींद जरूरी होती है और अगर कोई देर रात तक पढ़ाई, काम या किसी स्ट्रेस की वजह से जगा है तो सुबह 10-11 बजे तक उठना आलस नहीं बल्कि उसके शरीर की जरूरत हो सकती है। नींद पूरी हुए बिना उठा देना शरीर के लिए थकानभरा हो सकता है।

नींद पूरी होने के कई फायदे हैं

डॉक्टर वोरा का कहना है कि आराम-हराम है वाली सोच बदलकर नींद पूरी करने दो वाली सोच होनी चाहिए। हर शरीर की अपनी जरूरतें होती हैं और नींद भी उसी में से एक है। किसी की नींद 6 घंटे में ही पूरी हो सकती है, तो वहीं कुछ लोगों को 10 घंटे की नींद चाहिए होती है। चलिए बताते हैं नींद पूरी होने के फायदे क्या हैं-

-दिमाग रीसेट होता है

-मूड बेहतर रहता है

-इम्यून सिस्टम मजबूत होता है

-नींद पूरी होने के बाद शरीर एक्टिव रहता है

-निर्णय लेने की क्षमता बेहतर होती है

-शरीर की प्राकृतिक रिकवरी प्रक्रिया पूरी होती है

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