महासमुंद/सरायपाली। छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में कोटवारी सेवा भूमि से जुड़ा एक मामला अब कलेक्टर जनदर्शन तक पहुंच गया है। पिथौरा तहसील के ग्राम रामपुर की एक भूमि के रिकॉर्ड और नामांतरण को लेकर शिकायतकर्ता जय कुमार सारथी ने सरायपाली वन परिक्षेत्र के उप वन मंडलाधिकारी उदेराम बसंत से जुड़े होने का आरोप लगाते हुए जांच की मांग की है।
शिकायतकर्ता का दावा है कि संबंधित जमीन शासकीय सेवा भूमि है और इसके रिकॉर्ड में समय के साथ कई नाम दर्ज हुए हैं। उन्होंने प्रशासन को जमीन से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध कराते हुए पुराने और वर्तमान राजस्व रिकॉर्ड की जांच कराने की मांग की है।
हालांकि, शिकायत में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसलिए जमीन की वास्तविक स्थिति और नामांतरण की प्रक्रिया को लेकर अंतिम निष्कर्ष प्रशासनिक जांच के बाद ही सामने आ सकेगा।
पहले मां के नाम, फिर दूसरे नामों की एंट्री का दावा
शिकायतकर्ता के अनुसार ग्राम रामपुर में मौजूद संबंधित जमीन को स्थानीय स्तर पर ग्राम नौकर या कोटवारी सेवा भूमि के रूप में जाना जाता है।
आरोप है कि इस भूमि के रिकॉर्ड में कथित तौर पर पहले उदेराम बसंत की मां का नाम दर्ज हुआ। इसके बाद कुछ वर्षों में रिकॉर्ड में उदेराम बसंत, उनके रिश्तेदारों और अन्य व्यक्तियों के नाम दर्ज होने का दावा शिकायतकर्ता ने किया है।
यही बदलाव अब शिकायत का मुख्य आधार बताया जा रहा है।
शिकायतकर्ता ने प्रशासन से यह पता लगाने की मांग की है कि जमीन का मूल स्वरूप क्या था और बाद में नामांतरण किस आदेश या दस्तावेज के आधार पर किया गया।
राजस्व रिकॉर्ड से सामने आएगा पूरा सच
इस मामले में सबसे अहम भूमिका राजस्व रिकॉर्ड की होगी। यदि प्रशासन शिकायत की जांच करता है तो जमीन के पुराने रिकॉर्ड से लेकर वर्तमान रिकॉर्ड तक का मिलान किया जा सकता है।
जांच में मुख्य रूप से इन बिंदुओं पर ध्यान दिया जा सकता है—
- जमीन का मूल रिकॉर्ड किसके नाम और किस प्रकृति में दर्ज था?
- क्या जमीन वास्तव में शासकीय सेवा या कोटवारी भूमि है?
- रिकॉर्ड में नाम परिवर्तन कब-कब हुआ?
- नामांतरण के लिए कौन से दस्तावेज प्रस्तुत किए गए?
- नामांतरण किस सक्षम अधिकारी के आदेश से हुआ?
- वर्तमान में जमीन किन लोगों के नाम दर्ज है?
- पूरी प्रक्रिया संबंधित नियमों के अनुसार हुई या नहीं?
अधिकारी पर पद के कथित दुरुपयोग का आरोप
शिकायतकर्ता जय कुमार सारथी ने उदेराम बसंत के सरकारी सेवा काल और उनकी चल-अचल संपत्ति को लेकर भी सवाल उठाए हैं।
उनका आरोप है कि शासकीय सेवा के दौरान पद और प्रभाव का कथित रूप से दुरुपयोग किया गया। शिकायत में छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 के नियम 19(1) के कथित उल्लंघन का भी उल्लेख किया गया है।
लेकिन यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ये आरोप शिकायतकर्ता की ओर से लगाए गए हैं। इनकी सत्यता की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। संबंधित दस्तावेजों और प्रशासनिक जांच के बाद ही आरोपों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी।
सरकारी जमीन के मामलों में समान कार्रवाई की मांग
शिकायतकर्ता ने प्रशासन के सामने यह सवाल भी रखा है कि ग्रामीणों द्वारा वन या शासकीय जमीन पर कब्जे की शिकायत मिलने पर विभागीय स्तर पर कार्रवाई की जाती है और जमीन को कब्जे से मुक्त कराने की प्रक्रिया अपनाई जाती है।
ऐसे में यदि किसी सरकारी अधिकारी से जुड़े मामले में शासकीय जमीन के रिकॉर्ड और नामांतरण को लेकर शिकायत सामने आती है तो उसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
इसी मांग के साथ शिकायतकर्ता ने कलेक्टर जनदर्शन में आवेदन दिया है।
पुराने दस्तावेजों की जांच से खुल सकते हैं कई राज
यदि मामले की जांच शुरू होती है तो संबंधित भूमि के पुराने खसरे, राजस्व रिकॉर्ड, नामांतरण आदेश, आवेदन, दस्तावेज और वर्तमान रिकॉर्ड की जांच महत्वपूर्ण होगी।
पुराने और वर्तमान रिकॉर्ड में यदि कोई बड़ा अंतर मिलता है तो यह भी देखा जा सकता है कि रिकॉर्ड में बदलाव किस प्रक्रिया के तहत किया गया।
वहीं, यदि जांच में सभी दस्तावेज और नामांतरण प्रक्रिया नियमों के अनुरूप पाए जाते हैं तो शिकायत में लगाए गए आरोपों की स्थिति भी स्पष्ट हो जाएगी।
इसलिए फिलहाल शिकायत के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
अधिकारी का पक्ष अभी सामने नहीं आया
समाचार तैयार किए जाने तक उप वन मंडलाधिकारी उदेराम बसंत का पक्ष प्राप्त नहीं हो सका है। उनका पक्ष सामने आने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
शिकायतकर्ता ने सरायपाली वन परिक्षेत्र से जुड़े विकास कार्यों और अन्य मामलों के दस्तावेज आगामी रिपोर्ट में सामने रखने की बात कही है।
अब पूरे मामले में नजर प्रशासन की अगली कार्रवाई पर है। यदि कलेक्टर जनदर्शन में प्रस्तुत शिकायत और दस्तावेजों की जांच होती है, तो कोटवारी सेवा भूमि के पुराने रिकॉर्ड, वर्तमान नामांतरण और जमीन की वास्तविक प्रकृति को लेकर स्थिति साफ हो सकती है।
फिलहाल यह मामला शिकायत, आरोप और प्रस्तुत दस्तावेजों के स्तर पर है। प्रशासनिक जांच के बाद ही यह पता चलेगा कि भूमि रिकॉर्ड में बदलाव किस प्रक्रिया के तहत हुआ और शिकायत में लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है।
