ईरान-अमेरिका युद्ध से बढ़ा वैश्विक तनाव, क्या फिर लौटेगी गैस-तेल की किल्लत? जानिए पूरी कहानी

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मध्य पूर्व में एक बार फिर युद्ध की स्थिति गंभीर हो गई है। अमेरिका और ईरान के बीच जून में हुआ शांति समझौता अब पूरी तरह से टूट चुका है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तेल टैंकरों पर हुए हमलों के बाद दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव फिर से शुरू हो गया है। अमेरिकी हवाई हमलों के जवाब में ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए पलटवार किया है, जिससे वैश्विक स्तर पर एक बार फिर गैस और तेल की भारी किल्लत होने और कीमतों में बेतहाशा वृद्धि की आशंका पैदा हो गई है।

क्या है पूरा ताजा घटनाक्रम?

हालिया विवाद की शुरुआत तब हुई जब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तीन कॉमर्शियल जहाजों को निशाना बनाया गया। इनमें कतर का एक LNG टैंकर और सऊदी अरब का एक तेल टैंकर शामिल था।

अमेरिका ने क्यों किया इतना भीषण हमला?

अमेरिका ने इन हमलों के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराया। इसके जवाब में, अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने ईरान की वायु रक्षा प्रणालियों, रडार साइटों, एंटी-शिप मिसाइल और ड्रोन लॉन्च साइटों पर बड़े हवाई हमले किए। ईरान के प्रमुख बंदरगाह शहर बुशहर में भी कई धमाकों की पुष्टि हुई है। एक अमेरिकी अधिकारी के मुताबिक, होर्मुज में जहाजों पर हमले के बाद अमेरिका ने इसे ‘सजा’ के तौर पर अंजाम दिया है। यह कार्रवाई पिछले हमलों की तुलना में 4-5 गुना अधिक व्यापक और शक्तिशाली थी। हमले के बाद ईरान के बंदर अब्बास, सिरीक और केशम द्वीप पर कई धमाकों की आवाज सुनी गई।

खत्म हुई शांति, शुरू हुआ युद्ध

ईरान का पलटवार: कुवैत और बहरीन में गूंजे सायरन

इसके तुरंत बाद ईरान की ओर से जवाबी कार्रवाई की गई। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने क्षेत्र में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के ठिकानों को निशाना बनाते हुए मिसाइलें दागी हैं। बहरीन और कुवैत में मिसाइल अलर्ट सायरन बजने की खबरें सामने आई हैं।

अमेरिकी हमलों के बाद ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) का दावा है कि उसने बहरीन और कुवैत में 85 अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। इनमें बहरीन का ईसा एयर बेस भी शामिल है। IRGC ने बुशहर प्रांत के ऊपर अमेरिका के एक MQ-9 ड्रोन को मार गिराने का भी दावा किया है।

ईरानी हमलों के चलते बहरीन और कुवैत में कई बार हवाई हमले के अलर्ट (सायरन) बजे। कुवैत की सेना ने अपने एयर डिफेंस सिस्टम से कई ‘दुश्मन’ मिसाइलों और ड्रोन्स को मार गिराने की पुष्टि की है। ईरान के शीर्ष वार्ताकार कलीबाफ ने स्पष्ट किया है कि “धमकाने और जबरन वसूली का दौर खत्म हो गया है, हम झुकने वाले नहीं हैं।”

शांति समझौता (डील) खत्म

इस पूरे तनाव का सबसे बड़ा कूटनीतिक नतीजा यह निकला कि अमेरिका ने वह विशेष लाइसेंस रद्द कर दिया है, जिसके तहत ईरान को अस्थायी तौर पर अपना तेल बेचने की अनुमति दी गई थी। वाइट हाउस ने स्पष्ट कर दिया है कि ईरान की कार्रवाइयां पूरी तरह से अस्वीकार्य हैं। यह कदम अमेरिका-ईरान के बीच हुए उस समझौते (MoU) का अंत है, जिसे युद्ध समाप्त करने के लिए लाया गया था।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को कहा कि युद्ध को खत्म करने के लिए ईरान के साथ किया गया समझौता “खत्म” हो गया है। उन्होंने यह भी कहा कि वह तेहरान के साथ कोई बातचीत नहीं करना चाहते।

ट्रंप ने कहा, “मुझे लगता है कि यह मामला अब खत्म हो चुका है। मैं अब उनसे कोई बातचीत नहीं करना चाहता। वे बहुत बुरे लोग हैं… उनकी अगुवाई बीमार मानसिकता वाले लोग कर रहे हैं… मैं हमारे बातचीत करने वालों से बात करूंगा। वे बातचीत करना चाहते हैं-वे अच्छे लोग हैं… लेकिन ईरान को मेरे पास वापस आना होगा। जहां तक ​​मेरी बात है, उनके साथ बातचीत करना सिर्फ समय की बर्बादी है।” ट्रंप तुर्की की राजधानी अंकारा में नाटो शिखर सम्मेलन से पहले बोल रहे थे।

होर्मुज संकट से फिर बढ़ेंगी पेट्रोल-डीजल की कीमतें

सहयोगी देशों (NATO) से निराश हैं डोनाल्ड ट्रंप

तुर्की में नाटो शिखर सम्मेलन में मौजूद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस युद्ध में सहयोगियों के रवैये पर गहरी निराशा जताई है। ट्रंप ने कहा कि वह नाटो देशों का “टेस्ट” ले रहे थे। उन्होंने कहा कि मदद मांगने पर इटली, जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों ने अमेरिका का साथ नहीं दिया। ट्रंप ने यहां तक कि इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी का भी मजाक उड़ाया। हालांकि, नाटो प्रमुख मार्क रुटे और डच प्रधानमंत्री ने ईरान पर अमेरिकी हमलों को बिल्कुल ‘जरूरी’ कदम बताया है।

होर्मुज का कनेक्शन: क्यों लौट सकती है गैस-तेल की किल्लत?

इस पूरे विवाद के केंद्र में ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ है, जो दुनिया के ऊर्जा बाजार की सबसे अहम जीवन रेखा है। युद्ध की वजह से गैस और तेल का संकट गहराने के मुख्य कारण कई हैं।

दरअसल दुनिया भर में ट्रेड होने वाले कुल कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस (LNG) का लगभग 20 प्रतिशत यानी पांचवां हिस्सा इसी संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है। सऊदी अरब, यूएई, कतर और इराक जैसे बड़े तेल उत्पादक देशों का निर्यात इसी मार्ग पर निर्भर है।

ताजा हमलों के बाद अमेरिका के नेतृत्व वाले ‘जॉइंट मैरीटाइम इंफॉर्मेशन सेंटर (JMIC)’ ने इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों के लिए खतरे के स्तर को बढ़ाकर अत्यंत गंभीर कर दिया है।

ईरान ने कई बार चेतावनी दी है कि वह इस जलमार्ग को ब्लॉक कर सकता है। अगर सैन्य टकराव बढ़ता है, तो कमर्शियल शिप्स सुरक्षा कारणों से इस रास्ते का इस्तेमाल बंद कर देंगे। जहाजों का इंश्योरेंस प्रीमियम आसमान छूने लगेगा और वैश्विक बाजार में रातों-रात तेल और गैस की सप्लाई बाधित हो जाएगी।

सप्लाई रुकने की आशंका के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें तेजी से भागने लगती हैं। 2026 की शुरुआत में हुए युद्ध के दौरान भी तेल की कीमतें अपने चरम पर पहुंच गई थीं। अब जबकि तेल बेचने की डील रद्द हो चुकी है और ईरान के कच्चे तेल की सप्लाई मार्केट से बाहर हो गई है, तो दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल और गैस की किल्लत दोबारा शुरू हो सकती है।

यदि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में स्थिति को जल्द कूटनीतिक तरीके से नहीं संभाला गया, तो भारत जैसे देशों (जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर हैं) को एक बार फिर महंगाई और ईंधन की कमी के गंभीर संकट का सामना करना पड़ सकता है।

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