ISRO की बड़ी छलांग! तमिलनाडु में सफल रहा अगली पीढ़ी के रॉकेट इंजन का 88% थ्रस्ट टेस्ट

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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन Indian Space Research Organisation ने अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। संगठन ने तमिलनाडु स्थित अपने प्रोपल्शन कॉम्प्लेक्स में अगली पीढ़ी के सेमी-क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन के पावर हेड का सफल ‘हॉट टेस्ट’ किया है।

यह परीक्षण 175 टन थ्रस्ट यानी लगभग 88 प्रतिशत क्षमता पर किया गया, जो इस इंजन के विकास में एक बड़ा तकनीकी कदम माना जा रहा है।

क्या है यह सफल परीक्षण?

ISRO के अनुसार यह परीक्षण इंजन की स्थिरता, दक्षता और उच्च थ्रस्ट क्षमता को जांचने के लिए किया गया था। इस दौरान इंजन के पावर हेड का प्रदर्शन पूरी तरह स्थिर पाया गया, जो भविष्य के मिशनों के लिए एक सकारात्मक संकेत है।

परीक्षण की प्रमुख बातें:

  • 175 टन थ्रस्ट स्तर पर सफल संचालन
  • 88% क्षमता पर इंजन का स्थिर प्रदर्शन
  • पहले 47% और 60% थ्रस्ट परीक्षण भी सफल रहे
  • आगे 100% (200 टन) थ्रस्ट टेस्ट की तैयारी

भारत के अंतरिक्ष मिशनों के लिए क्यों है अहम?

यह सेमी-क्रायोजेनिक इंजन भारत के भविष्य के भारी रॉकेट लॉन्च वाहनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसे मौजूदा लॉन्च व्हीकल प्रणाली को और अधिक शक्तिशाली और कुशल बनाने के लिए विकसित किया जा रहा है।

इस तकनीक के सफल होने से भारत की अंतरिक्ष क्षमता में बड़ा बदलाव आने की उम्मीद है।

LVM3 रॉकेट सिस्टम में बड़ा अपग्रेड

इस नए इंजन को भारत के LVM3 रॉकेट में इस्तेमाल किए जाने वाले L110 कोर स्टेज के स्थान पर विकसित किया जा रहा है।

इसके संभावित फायदे:

  • अधिक पेलोड क्षमता
  • बेहतर ईंधन दक्षता
  • भारी उपग्रहों का आसान प्रक्षेपण
  • लंबी दूरी के अंतरिक्ष मिशनों में सुधार

नई तकनीक में इस्तेमाल हो रहा ईंधन

यह इंजन लिक्विड ऑक्सीजन और केरोसिन आधारित ईंधन का उपयोग करता है, जिसे सेमी-क्रायोजेनिक तकनीक कहा जाता है। यह पारंपरिक प्रणोदन प्रणालियों की तुलना में अधिक शक्तिशाली और कुशल माना जाता है।

भारत की अंतरिक्ष ताकत में नया अध्याय

विशेषज्ञों का मानना है कि यह सफलता भारत को अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में और अधिक आत्मनिर्भर बनाएगी। आने वाले वर्षों में इस तकनीक के सफल विकास से भारत के भारी उपग्रह मिशन और गहरे अंतरिक्ष अभियानों को नई दिशा मिलेगी।

ISRO लगातार इस इंजन को पूर्ण क्षमता (200 टन थ्रस्ट) तक परीक्षण करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यदि यह चरण सफल रहता है, तो भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी।

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