धमतरी: जिले के ग्राम तुमाखुर्द में एक अनोखी कहानी सामने आती है, जहां 64 वर्षीय सियाराम कोर्राम बीते कई दशकों से अकेले जीवन बिता रहे हैं। जिला मुख्यालय धमतरी से लगभग 18 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में कभी सैकड़ों लोगों की आबादी थी, लेकिन आज यहां सिर्फ एक ही व्यक्ति निवास कर रहा है।
गंगरेल बांध बनने से खाली हुआ गांव
तुमाखुर्द गांव के वीरान होने की कहानी गंगरेल बांध के निर्माण से जुड़ी है। बांध बनने के बाद जलभराव के कारण गांव के खेत-खलिहान और अधिकांश आबादी क्षेत्र पानी में डूब गए। इसके चलते 1970-80 के दशक में ग्रामीणों को अपना घर छोड़कर अन्य स्थानों पर बसना पड़ा।
हालांकि, सियाराम कोर्राम ने गांव छोड़ने से इनकार कर दिया और तब से आज तक यहीं रह रहे हैं। उनका कहना है कि अब इस गांव से उनका नाता इतना गहरा हो चुका है कि वे यहां से केवल अंतिम यात्रा में ही जाएंगे।
बिना सुविधाओं के कठिन जीवन
सियाराम कोर्राम का जीवन बेहद सादा और कठिन है। गांव में न बिजली की सुविधा है और न ही नियमित जलस्रोत उपलब्ध हैं। वे गंगरेल बांध के डुबान क्षेत्र में संग्रहित पानी का उपयोग पीने के लिए करते हैं।
सरकार द्वारा पाइपलाइन और सोलर सिस्टम जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं, लेकिन पाइपलाइन में पानी नहीं आता और सोलर सिस्टम भी पूरी तरह प्रभावी नहीं है।
जंगली जानवरों के बीच बेखौफ जीवन
घने जंगलों से घिरे इस इलाके में जंगली जानवरों का आना-जाना आम बात है। सियाराम बताते हैं कि उन्हें कभी किसी जानवर से डर नहीं लगा। हाथी, तेंदुए और भालू जैसे जानवर कई बार उनके आसपास घूमते रहते हैं।
एक बार हाथियों ने उनकी कुटिया को नुकसान भी पहुंचाया, लेकिन इसके बावजूद उनका भय खत्म नहीं हुआ। वे कहते हैं कि हाथियों का आना उन्हें अच्छा लगता है।
अलग जीवनशैली और अनोखे शौक
आधुनिक संसाधनों से दूर सियाराम कोर्राम की जीवनशैली बेहद अलग है। उन्हें मोबाइल, टीवी जैसी सुविधाओं की आवश्यकता महसूस नहीं होती। वे दिनभर छोटे-मोटे काम और मत्स्याखेट कर अपना गुजारा करते हैं।
उनका भोजन भी सीमित है। वे दिन में सिर्फ एक बार रात को भोजन करते हैं और बाकी समय चाय पर निर्भर रहते हैं। गर्मी के दिनों में वे पेड़ों पर बने मचान पर सोना पसंद करते हैं, जो उनके अनोखे शौक को दर्शाता है।
रामटेकरी से जुड़ी आस्था
तुमाखुर्द गांव के पास स्थित रामटेकरी धार्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। मान्यता है कि भगवान राम वनगमन के दौरान यहां ठहरे थे। यह स्थान रामवनगमन पथ में शामिल है, जहां श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।
रामटेकरी से करीब आधा किलोमीटर दूर स्थित इस गांव की पहचान अब सियाराम कोर्राम के अकेले जीवन के कारण भी बनी हुई है।
