आठ साल से गोदाम में बंद टिफिन बॉक्स! मजदूरों की थाली खाली, करोड़ों की खरीदी पर उठे बड़े सवाल

प्रादेशिक मुख्य समाचार

छुरा। छत्तीसगढ़ में मनरेगा के जॉब कार्डधारी मजदूरों के लिए शुरू की गई टिफिन बॉक्स योजना आठ साल बाद भी सवालों के घेरे में है। वर्ष 2018 में मजदूरों को सुविधा देने के उद्देश्य से खरीदे गए स्टील के टिफिन बॉक्स प्रदेश के कई हिस्सों में अब भी गोदामों में पड़े होने की बात सामने आ रही है। जिस सामग्री को मजदूरों तक पहुंचाने के लिए सरकारी राशि खर्च की गई थी, उसका लाभ आज तक सभी पात्र हितग्राहियों को नहीं मिल पाया है।

योजना को लेकर अब खरीदी से लेकर परिवहन, भंडारण और वितरण तक कई सवाल उठ रहे हैं। खासतौर पर यह जानना जरूरी हो गया है कि वर्ष 2018 में कितने टिफिन बॉक्स खरीदे गए थे, उन पर कितनी राशि खर्च हुई और आठ साल बाद कितनी सामग्री वास्तव में मजदूरों तक पहुंची।

2018 में हुई थी टिफिन बॉक्स योजना की शुरुआत

प्रदेश के करीब 12 लाख मनरेगा जॉब कार्डधारी मजदूरों को टिफिन बॉक्स उपलब्ध कराने की योजना वर्ष 2018 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने ग्राम सुराज अभियान के दौरान अंबिकापुर में घोषित की थी।

इसके बाद टेंडर प्रक्रिया के जरिए टिफिन बॉक्स की खरीदी की गई। अलग-अलग विकासखंडों और जनपद पंचायतों तक सामग्री पहुंचाने के लिए परिवहन की व्यवस्था भी की गई। कई स्थानों पर वितरण की प्रक्रिया शुरू होने की बात भी सामने आई।

लेकिन विधानसभा चुनाव के दौरान आचार संहिता लागू होने के बाद यह प्रक्रिया रुक गई। इसके बाद सत्ता परिवर्तन हुआ और समय बीतता गया। आरोप है कि कई जगहों पर टिफिन बॉक्स का वितरण दोबारा व्यवस्थित तरीके से शुरू नहीं हो सका।

आठ साल बाद भी गोदामों में डिब्बे होने का दावा

त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था से जुड़े कुछ कर्मचारियों के मुताबिक टिफिन बॉक्स का मुद्दा जिला और प्रदेश स्तर की बैठकों में कई बार उठ चुका है। उनका कहना है कि लंबे समय से इस सामग्री के वितरण को लेकर स्पष्ट निर्णय का इंतजार है।

हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि संबंधित विभाग के रिकॉर्ड और शासन के अधिकृत बयान से होना बाकी है। इसलिए फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि पूरे प्रदेश में कितने टिफिन बॉक्स अब भी गोदामों में रखे हैं और कितने का वितरण किया जा चुका है।

यही वजह है कि अब वर्ष 2018 से लेकर वर्तमान समय तक की पूरी प्रक्रिया का रिकॉर्ड सामने लाने की मांग उठ रही है।

खरीदी और भंडारण पर उठ रहे कई सवाल

सरकारी सामग्री लंबे समय तक गोदाम में रखे जाने से उसकी गुणवत्ता और भंडारण लागत को लेकर भी सवाल खड़े होते हैं। यदि टिफिन बॉक्स वर्षों से किसी किराए के गोदाम में रखे हैं तो उनके भंडारण पर अब तक कितना खर्च हुआ, यह भी महत्वपूर्ण जानकारी है।

इसके अलावा यह भी पता चलना जरूरी है कि लंबे समय तक पैक रहने के बाद इन टिफिन बॉक्स की वर्तमान स्थिति क्या है।

मामले में प्रमुख सवाल इस तरह हैं—

  • वर्ष 2018 में कुल कितने टिफिन बॉक्स खरीदे गए?
  • खरीद पर सरकार ने कितनी राशि खर्च की?
  • टेंडर किस कंपनी या एजेंसी को और किस प्रक्रिया से दिया गया?
  • टिफिन बॉक्स को जिलों और विकासखंडों तक पहुंचाने में कितना खर्च हुआ?
  • कितने टिफिन बॉक्स का वितरण किया जा चुका है?
  • कितनी सामग्री अब भी गोदामों में मौजूद है?
  • गोदामों में रखने पर कितना किराया और अन्य खर्च हुआ?
  • सामग्री की वर्तमान गुणवत्ता की जांच कब और किस स्तर पर हुई?
  • वितरण रुकने के बाद जिम्मेदारी किस अधिकारी या विभाग की थी?

‘टिफिन बम’ जैसा क्यों बन गया मामला?

वर्षों से सरकारी सामग्री के गोदाम में पड़े रहने को लेकर स्थानीय स्तर पर इसे व्यंग्यात्मक रूप से ‘टिफिन बम’ जैसा मामला भी कहा जा रहा है। वजह साफ है—समय बीतने के साथ खरीदी, परिवहन, स्टॉक और वितरण से जुड़े सवाल लगातार बढ़ते जा रहे हैं।

यदि सामग्री अब भी उपयोग योग्य है तो पात्र मनरेगा मजदूरों तक इसे पहुंचाने में देरी क्यों हो रही है? वहीं अगर टिफिन बॉक्स खराब हो चुके हैं तो उनके निस्तारण और नुकसान की जिम्मेदारी किसकी होगी? इन सवालों का जवाब आधिकारिक रिकॉर्ड से ही स्पष्ट हो सकेगा।

अब दो ही रास्ते—वितरण या निस्तारण

आठ साल पुरानी सामग्री को लेकर अब निर्णय लेना जरूरी नजर आ रहा है। यदि टिफिन बॉक्स अच्छी स्थिति में हैं तो शासन इन्हें पात्र मजदूरों तक पहुंचाने की प्रक्रिया शुरू कर सकता है। दूसरी ओर, यदि सामग्री निर्धारित मानकों के अनुसार उपयोग योग्य नहीं रह गई है तो नियमों के तहत उसके निस्तारण की प्रक्रिया अपनानी होगी।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरे मामले में पारदर्शिता के लिए खरीदी से लेकर वर्तमान स्टॉक तक का पूरा ब्यौरा सामने आए।

मजदूरों को कब मिलेगा योजना का लाभ?

जिस उद्देश्य से टिफिन बॉक्स खरीदे गए थे, वह था मजदूरों को काम के दौरान भोजन रखने की सुविधा देना। ऐसे में आठ वर्ष बाद भी यदि बड़ी मात्रा में सामग्री वितरण का इंतजार कर रही है तो यह निश्चित रूप से जांच और जवाबदेही का विषय बनता है।

अब निगाह इस बात पर है कि शासन और संबंधित विभाग इस मामले में क्या निर्णय लेते हैं। क्या वर्षों से रखे टिफिन बॉक्स पात्र मनरेगा मजदूरों तक पहुंचेंगे, या फिर अनुपयोगी हो चुकी सामग्री के निस्तारण की प्रक्रिया शुरू होगी—इसका जवाब आधिकारिक आदेश और रिकॉर्ड सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा।

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