अंटार्कटिका की बर्फ में छिपे रहस्य ने दिलाया नोबेल
विज्ञान की दुनिया में कुछ ऐसे कण भी मौजूद हैं, जो हर पल हमारे शरीर, धरती और यहां तक कि पूरे ग्रह के आर-पार गुजरते रहते हैं, लेकिन हमें उनका एहसास तक नहीं होता। इन्हीं रहस्यमयी कणों को न्यूट्रिनो कहा जाता है। इन्हें आमतौर पर ‘घोस्ट पार्टिकल’ यानी भूतिया कण भी कहा जाता है।
वर्ष 2026 का फिजिक्स नोबेल पुरस्कार प्रसिद्ध वैज्ञानिक फ्रांसिस हाल्जेन को न्यूट्रिनो के अध्ययन और ब्रह्मांडीय न्यूट्रिनो का पता लगाने के लिए विकसित की गई IceCube परियोजना में उनके असाधारण योगदान के लिए देने की घोषणा की गई है।
रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज के इस सम्मान ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान न्यूट्रिनो जैसे बेहद सूक्ष्म कणों और ब्रह्मांड के उन रहस्यों की ओर खींचा है, जिन्हें समझने के लिए वैज्ञानिक दशकों से प्रयास कर रहे हैं।
क्या होते हैं न्यूट्रिनो?
न्यूट्रिनो बेहद हल्के और विद्युत रूप से उदासीन उपपरमाण्विक कण हैं। ये पदार्थ के साथ बहुत कमजोर तरीके से प्रतिक्रिया करते हैं। यही वजह है कि अरबों-खरबों न्यूट्रिनो लगातार पृथ्वी से गुजर सकते हैं और हमें इसकी जानकारी तक नहीं होती।
इनकी कुछ खास बातें इन्हें दूसरे कणों से अलग बनाती हैं:
- न्यूट्रिनो पर कोई विद्युत आवेश नहीं होता।
- इनका द्रव्यमान बेहद कम होता है।
- ये लगभग प्रकाश की गति से यात्रा करते हैं।
- पदार्थ के साथ इनकी प्रतिक्रिया बेहद कमजोर होती है।
- ये अंतरिक्ष में बहुत लंबी दूरी तय कर सकते हैं।
इसी वजह से न्यूट्रिनो वैज्ञानिकों के लिए किसी तरह के ब्रह्मांडीय संदेशवाहक की तरह काम कर सकते हैं।
‘घोस्ट पार्टिकल’ नाम क्यों पड़ा?
न्यूट्रिनो को ‘घोस्ट पार्टिकल’ कहने की वजह बेहद दिलचस्प है। आम तौर पर जब कोई कण पदार्थ से टकराता है तो उसका प्रभाव देखा जा सकता है, लेकिन न्यूट्रिनो अधिकांश पदार्थ को लगभग बिना प्रभावित किए पार कर जाते हैं।
कल्पना कीजिए कि किसी अदृश्य चीज के अरबों कण हर सेकंड आपके शरीर के आर-पार गुजर रहे हों और आपको कुछ भी महसूस न हो। न्यूट्रिनो की प्रकृति कुछ ऐसी ही है।
हालांकि, इनकी यही विशेषता वैज्ञानिकों के लिए चुनौती भी है। न्यूट्रिनो को सीधे पकड़ना बेहद मुश्किल होता है। इसी चुनौती का समाधान तलाशने में फ्रांसिस हाल्जेन के काम की अहम भूमिका रही।
2.5 किलोमीटर बर्फ के नीचे बना IceCube
फ्रांसिस हाल्जेन और उनकी टीम की सबसे बड़ी उपलब्धियों में IceCube Neutrino Observatory को विकसित करना शामिल है। यह प्रयोग अंटार्कटिका के दक्षिणी ध्रुव के पास बर्फ की गहराई में स्थापित किया गया है।
IceCube के सेंसर लगभग 2.5 किलोमीटर तक गहरी बर्फ में लगाए गए हैं। यह व्यवस्था इतनी अनोखी है कि इसे दुनिया के सबसे असाधारण वैज्ञानिक डिटेक्टरों में गिना जाता है।
यह पारंपरिक टेलीस्कोप की तरह केवल आसमान से आने वाली रोशनी को नहीं देखता। इसके सेंसर बर्फ के अंदर न्यूट्रिनो की दुर्लभ प्रतिक्रियाओं से पैदा होने वाले संकेतों को रिकॉर्ड करते हैं।
IceCube कैसे काम करता है?
सरल भाषा में समझें तो जब कोई उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो बर्फ के अंदर किसी परमाणु से प्रतिक्रिया करता है, तो उससे कुछ ऐसे कण पैदा हो सकते हैं जो प्रकाश की हल्की चमक उत्पन्न करते हैं।
IceCube में मौजूद संवेदनशील सेंसर इन संकेतों को पकड़ते हैं। इसके आधार पर वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश करते हैं कि न्यूट्रिनो कहां से आया और उसमें कितनी ऊर्जा थी।
2013 में मिली ऐतिहासिक सफलता
IceCube प्रयोग ने वर्ष 2013 में विज्ञान की दुनिया में बड़ी उपलब्धि हासिल की। वैज्ञानिकों ने हमारी आकाशगंगा के बाहर से आने वाले उच्च-ऊर्जा ब्रह्मांडीय न्यूट्रिनो के संकेतों की पहचान की।
इस खोज ने वैज्ञानिकों के सामने ब्रह्मांड को समझने का एक नया रास्ता खोल दिया।
क्योंकि न्यूट्रिनो अंतरिक्ष में मौजूद पदार्थ से बहुत कम प्रभावित होते हैं, वे अपने स्रोत की जानकारी अपेक्षाकृत सुरक्षित तरीके से पृथ्वी तक ला सकते हैं। इसका मतलब है कि वैज्ञानिक इन कणों के जरिए उन घटनाओं के बारे में जानकारी जुटा सकते हैं, जिन्हें सामान्य प्रकाश के जरिए समझना मुश्किल है।
ब्लैक होल और सुपरनोवा के राज खोलने में मदद
ब्रह्मांड में कई बेहद शक्तिशाली घटनाएं होती हैं। इनमें सुपरनोवा विस्फोट और ब्लैक होल के आसपास होने वाली अत्यधिक ऊर्जावान प्रक्रियाएं शामिल हैं।
इन घटनाओं से निकलने वाले उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो अंतरिक्ष में लंबी दूरी तय कर सकते हैं। जब वैज्ञानिक इनका पता लगाते हैं तो उन्हें इनके संभावित स्रोत और ब्रह्मांड में होने वाली शक्तिशाली प्रक्रियाओं को समझने में मदद मिलती है।
यानी न्यूट्रिनो सिर्फ एक कण नहीं, बल्कि वैज्ञानिकों के लिए ब्रह्मांड को पढ़ने का एक नया माध्यम बन चुके हैं।
82 वर्षीय फ्रांसिस हाल्जेन का लंबा वैज्ञानिक सफर
बेल्जियम में जन्मे फ्रांसिस हाल्जेन लंबे समय से अमेरिका की University of Wisconsin–Madison से जुड़े रहे हैं। न्यूट्रिनो के अध्ययन और अंटार्कटिका में इन्हें पकड़ने की महत्वाकांक्षी परियोजना को विकसित करने में उनका योगदान कई दशकों तक जारी रहा।
अंटार्कटिका जैसे अत्यंत कठिन वातावरण में इतनी बड़ी वैज्ञानिक प्रयोगशाला तैयार करना आसान नहीं था। जमा देने वाली ठंड, कई किलोमीटर मोटी बर्फ और बेहद चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बीच IceCube को स्थापित करना अपने आप में एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि रही।
क्यों महत्वपूर्ण है यह नोबेल?
फ्रांसिस हाल्जेन का काम इसलिए खास है क्योंकि उन्होंने वैज्ञानिकों को ब्रह्मांड को देखने का एक नया तरीका दिया। पहले वैज्ञानिक मुख्य रूप से प्रकाश और दूसरी विद्युतचुंबकीय तरंगों के जरिए अंतरिक्ष का अध्ययन करते थे। न्यूट्रिनो ने इस तस्वीर में एक नया आयाम जोड़ दिया।
अंटार्कटिका की बर्फ के नीचे बना IceCube अब उन अदृश्य कणों की आवाज सुनने का काम कर रहा है, जो अरबों किलोमीटर दूर ब्रह्मांडीय घटनाओं से निकलकर धरती तक पहुंचते हैं।
यही उपलब्धि फ्रांसिस हाल्जेन के वैज्ञानिक सफर को खास बनाती है और 2026 का फिजिक्स नोबेल पुरस्कार न्यूट्रिनो विज्ञान के लिए एक ऐतिहासिक सम्मान के रूप में देखा जा रहा है।
