नई दिल्ली, देशभर में 25 जून को संविधान हत्या दिवस के रूप में मनाए जा रहे दिन पर प्रधानमंत्री ने आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण दौर बताया। उन्होंने कहा कि वर्ष 1975 में लगाया गया आपातकाल संविधान की मूल भावना और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा आघात था।
प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर उन सभी नागरिकों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और सामाजिक संगठनों को श्रद्धांजलि अर्पित की, जिन्होंने उस दौर में लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए संघर्ष किया था।
लोकतांत्रिक संस्थाओं पर पड़ा था प्रभाव
प्रधानमंत्री ने कहा कि आपातकाल के दौरान नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक प्रतिबंध लगाए गए थे। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित कर दी गई थी और कई राजनीतिक नेताओं, पत्रकारों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया था।
उन्होंने कहा कि यह वह समय था जब लोकतंत्र की कई महत्वपूर्ण संस्थाओं को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा और देश ने अपने इतिहास के सबसे कठिन अध्यायों में से एक को देखा।
संघर्ष और साहस की भी कहानी है आपातकाल
प्रधानमंत्री ने कहा कि आपातकाल केवल राजनीतिक घटनाओं का दौर नहीं था, बल्कि यह उन लाखों भारतीयों के साहस और प्रतिबद्धता की भी कहानी है जिन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए आवाज उठाई।
उन्होंने कहा कि कई लोगों ने कठिन परिस्थितियों के बावजूद मौन रहने के बजाय लोकतंत्र और संविधान के आदर्शों की रक्षा करने का निर्णय लिया। उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।
संविधान देश की सामूहिक आकांक्षाओं का प्रतीक
प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि देश के करोड़ों नागरिकों की आकांक्षाओं, अधिकारों और कर्तव्यों का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे मूल सिद्धांत भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला हैं और देश इन मूल्यों को मजबूत करने के लिए निरंतर प्रयास करता रहेगा।
लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का संकल्प
संविधान हत्या दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री ने नागरिकों से लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को और मजबूत करने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि यह दिन केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि भविष्य के लिए सीख लेने और लोकतांत्रिक परंपराओं को सशक्त बनाने का भी अवसर है।
क्यों मनाया जाता है संविधान हत्या दिवस?
हर वर्ष 25 जून को संविधान हत्या दिवस मनाया जाता है। यह दिन वर्ष 1975 में लगाए गए आपातकाल की याद दिलाता है, जब देश में असाधारण राजनीतिक परिस्थितियों के बीच आपातकाल लागू किया गया था।
इस दिन का उद्देश्य लोकतांत्रिक संस्थाओं, नागरिक अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाना और भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिए लोकतांत्रिक चेतना को मजबूत करना है।
लोकतंत्र की मजबूती का संदेश
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी लोकतंत्र की शक्ति उसकी संस्थाओं, नागरिक स्वतंत्रताओं और संविधान के प्रति सम्मान में निहित होती है। ऐसे अवसर देश को अपने लोकतांत्रिक इतिहास को समझने और उससे सीख लेने का अवसर प्रदान करते हैं।
संविधान हत्या दिवस इसी संदेश को आगे बढ़ाता है कि लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों की रक्षा प्रत्येक नागरिक की साझा जिम्मेदारी है।
