रायपुर – राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता और आरक्षण पात्रता को लेकर एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। अनुसूचित जाति के आरक्षण लाभ की वैधता को लेकर दायर शिकायत पर उच्च स्तरीय प्रमाणिकरण छानबीन समिति ने विस्तृत परीक्षण के बाद आदेश जारी किया है। समिति के इस निर्णय के बाद नियुक्ति और पदोन्नति की पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

इस मामले को अधिवक्ता विजय मिश्रा ने दस्तावेजों के साथ उठाया था। उन्होंने संबंधित अधिकारी के जाति प्रमाण-पत्र और राज्यवार आरक्षण लाभ की वैधता को चुनौती देते हुए शिकायत दर्ज कराई थी। दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर यह मुद्दा पहले भी चर्चा में आया था, जिसके बाद प्रशासनिक स्तर पर हलचल तेज हुई और प्रकरण औपचारिक जांच तक पहुंचा। अब छानबीन समिति के आदेश ने मामले को निर्णायक मोड़ दे दिया है।

राष्ट्रपति अधिसूचना और निवास प्रमाण बना आधार
समिति द्वारा 26 फरवरी 2026 को जारी आदेश में उल्लेख किया गया है कि 10 अगस्त 1950 की राष्ट्रपति अधिसूचना के अनुसार अनुसूचित जाति और जनजाति की सूची राज्य-विशिष्ट होती है। यदि कोई व्यक्ति मूल रूप से किसी अन्य राज्य का निवासी पाया जाता है, तो दूसरे राज्य में उसे स्वतः आरक्षण लाभ नहीं मिल सकता।

जांच के दौरान 1978 से पूर्व छत्तीसगढ़ (तत्कालीन मध्यप्रदेश) में वैधानिक निवास का दस्तावेजी प्रमाण भी अनिवार्य माना गया। प्रस्तुत अभिलेखों में उक्त अवधि का स्पष्ट और निर्विवाद प्रमाण स्थापित नहीं हो सका, जिसके आधार पर समिति ने नियमानुसार आगे की कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
प्रमुख अभियंता के.के. कटारे के मामले से जुड़ा प्रकरण
यह पूरा मामला प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) में कार्यरत प्रमुख अभियंता के.के. कटारे से जुड़ा बताया जा रहा है। यदि आरक्षण श्रेणी की वैधता पर अंतिम स्तर पर प्रश्न खड़े होते हैं, तो कई महत्वपूर्ण मुद्दे सामने आते हैं।
इनमें यह प्रमुख है कि क्या प्रारंभिक नियुक्ति आरक्षित श्रेणी के आधार पर हुई थी, क्या पदोन्नति में भी उसी श्रेणी का लाभ लिया गया और यदि जाति प्रमाण-पत्र अमान्य घोषित होता है तो क्या पूर्व सेवा लाभों की समीक्षा की जाएगी।

1994 के विशेष भर्ती अभियान पर भी सवाल
जानकारी के अनुसार के.के. कटारे की नियुक्ति वर्ष 1994 में विशेष भर्ती अभियान के तहत हुई थी। यह भर्ती अभियान आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के लिए संचालित किया गया था, जिसमें केवल पात्र आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थी ही परीक्षा में शामिल हो सकते थे।
ऐसी स्थिति में यदि पात्रता ही प्रश्नांकित हो जाती है तो चयन, नियुक्ति और पदोन्नति की पूरी प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। प्रशासनिक हलकों में इस बात की चर्चा है कि यदि मूल आधार ही विधिक रूप से स्थापित नहीं होता, तो उस पर आधारित सेवा लाभों को वैधानिक संरक्षण देना मुश्किल हो सकता है।
शिकायतकर्ता की अहम भूमिका
इस पूरे प्रकरण में अधिवक्ता विजय मिश्रा की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उन्होंने राज्यवार आरक्षण सिद्धांत, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों और निवास संबंधी दस्तावेजों का हवाला देते हुए मामले की जांच की मांग की थी।
लगातार दस्तावेजी प्रयासों के बाद ही यह प्रकरण औपचारिक जांच तक पहुंचा। प्रशासनिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला दर्शाता है कि तथ्य और दस्तावेजों के साथ की गई शिकायतें व्यवस्था में कार्रवाई की राह खोल सकती हैं।
आपराधिक प्रकरण की भी संभावना
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि समिति के आदेश के बाद आगे क्या कार्रवाई होगी। शिकायतकर्ता के अनुसार यदि जाति प्रमाण-पत्र निरस्त होता है तो नियुक्ति और पदोन्नति से जुड़े आदेशों की विभागीय समीक्षा की जा सकती है। यदि दस्तावेजों में गलत जानकारी देने या तथ्य छिपाने की पुष्टि होती है तो विभागीय कार्रवाई के साथ-साथ आपराधिक मामला दर्ज होने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

पूरे प्रदेश में पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश प्रदेश में आरक्षण पात्रता से जुड़े मामलों के लिए नजीर बन सकता है। अन्य विभागों में भी पुराने जाति प्रमाण-पत्रों और आरक्षण लाभों की समीक्षा की मांग उठ सकती है।
फिलहाल सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि संबंधित पक्ष इस आदेश को न्यायालय में चुनौती देता है या नहीं और विभागीय स्तर पर आगे की कार्रवाई किस दिशा में जाती है।
