नई दिल्ली: खनन उद्योग के दिग्गज कारोबारी अनिल अग्रवाल के वेदांता ग्रुप ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है और गौतम अडानी समूह द्वारा जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड (JAL) के प्रस्तावित अधिग्रहण पर रोक लगाने की मांग की है। इसी के साथ अब कर्ज में डूबे जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड की दिवालिया समाधान प्रक्रिया के खिलाफ वेदांता की कानूनी चुनौती और तेज हो गई है। बता दें कि बीते रविवार को ही वेदांता के मालिक अनिल अग्रवाल ने सार्वजनिक तौर पर दावा किया है कि उनकी कंपनी वेदांता को जेपी समूह की संपत्ति की बोली जीतने की लिखित पुष्टि मिल गई थी, लेकिन बाद में यह फैसला बदल दिया गया। हालांकि, उन्होंने इसके कारणों पर विस्तार से कोई जानकारी नहीं दी।
सोशल मीडिया पर किया पोस्ट
अनिल अग्रवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि वेदांता को दिवालिया प्रक्रिया के तहत जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड को खरीदने के लिए सार्वजनिक रूप से सबसे ऊंची बोली लगाने वाला घोषित किया गया था। उन्होंने बताया कि उन्हें लिखित रूप में यह जानकारी दी गई थी कि उनकी कंपनी बोली जीत चुकी है, लेकिन कुछ दिन बाद यह निर्णय बदल दिया गया।
अडानी समूह को मिली है मंजूरी
जेपी समूह की इस प्रमुख कंपनी के लिए बोली में गौतम अडानी का समूह ही दूसरा बड़ा दावेदार था। ऋणदाताओं की समिति (सीओसी) ने दोनों कंपनियों की बोलियों का मूल्यांकन किया और बाद में अडानी समूह की बोली को मंजूरी के लिए राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) में भेज दिया। एनसीएलटी की इलाहाबाद पीठ ने अडानी समूह की बोली को मंजूरी दे दी, जिसके खिलाफ वेदांता समूह ने राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) में चुनौती दी है। हाल ही में हुई सुनवाई में एनसीएलएटी ने एनसीएलटी के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया और मामले की अगली सुनवाई 10 अप्रैल को तय की गई है।
करीब 57,185 करोड़ रुपये का लोन
जयप्रकाश एसोसिएट्स को जून, 2024 में दिवालिया प्रक्रिया में शामिल किया गया था क्योंकि कंपनी पर करीब 57,185 करोड़ रुपये का लोन था। पिछले साल नवंबर में ऋणदाताओं की समिति ने अदाणी समूह की योजना को मंजूरी दी थी। अडानी एंटरप्राइजेज को ऋणदाताओं के 89 प्रतिशत वोट मिले, जबकि अन्य दावेदारों में डालमिया सीमेंट और वेदांता समूह शामिल थे। ऋणदाताओं की समिति (सीओसी) ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि बोली का चयन केवल सबसे अधिक कीमत के आधार पर नहीं, बल्कि नकद भुगतान, व्यवहार्यता और समय पर क्रियान्वयन जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखकर किया जाता है।
ऋणदाताओं की समिति ने अडानी समूह की बोली को इसलिए प्राथमिकता दी क्योंकि इसमें करीब 6,000 करोड़ रुपये तुरंत भुगतान और दो साल में पूरा भुगतान करने का प्रस्ताव था, जबकि वेदांता की योजना में भुगतान की अवधि पांच साल तक थी। सीओसी ने वेदांता की संशोधित बोली को भी खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि वह बोली प्रक्रिया बंद होने के बाद दी गई थी और उसे स्वीकार करने के लिए प्रक्रिया को फिर से शुरू करना पड़ता। एनसीएलटी ने 17 मार्च को अडानी ग्रुप की 14,535 करोड़ रुपये की बोली को मंजूरी दे दी थी, जिसे वेदांता ने एनसीएलएटी में चुनौती दी है।
