उत्तरकाशी आपदा: विशेषज्ञों ने बादल फटने की थ्योरी को खारिज किया, ग्लेशियर टूटने या झील फटने की संभावना जताई

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नई दिल्ली, उत्तरकाशी के धराली गांव में खीरगंगा नदी के सैलाब के साथ आए मलबे में लाशों की खोजबीन जारी है। NDRF के डीआईजी ऑपरेशन मोहसिन शहीदी ने बताया कि 50 लोगों के लापता होने की जानकारी मिली है। इतनी बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने के बारे में अधिकारियों का कहना है कि सैलाब इतनी तेजी से आया कि किसी को बचने का मौका तक नहीं मिला। वहीं विशेषज्ञ इस आपदा के लिए बादल फटने की थ्यौरी पर संदेह जता रहे हैं। साथ ही हिमस्खलन, ग्लेशियर टूटने या झील के फटने की संभावना भी जता रहे हैं।

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट के मुताबिक, मौसम विज्ञान और उपग्रह डेटा का अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि धराली गांव में अचानक आई बाढ़ का कारण बादल फटने की जगह ग्लेशियर का टूटना या ऊपर की ओर किसी हिमनद झील का फूटना हो सकता है। इसके साथ ही वैज्ञानिकों ने उन सबूतों की पड़ताल शुरू कर दी है जो संकेत देते हैं कि ऊपर की ओर एक बड़े हिमस्खलन, ग्लेशियर टूटने या झील के फटने से यह विनाशकारी बाढ़ आई होगी।

स्थानीय लोगों का भी कहना है कि उन्होंने ऐसी जल प्रलय पहली बार देखी है। खीरगंगा नदी में आए सैलाब की स्पीड इतनी तेज थी कि पल भर में ही सब कुछ खत्म हो गया। किसी को संभलने या भाग निकलने का मौका तक नहीं मिला। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट के मुताबिक, मौसम विभाग का भी कहना है कि आपदा के समय के धराली और आसपास के इलाकों में न्यूनतम बारिश दर्ज की गई। ऐसे में बादल फटने की थ्यौरी पर सवाल उठ रहे हैं।

मौसम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि मंगलवार को हर्षिल में केवल 6.5 मिमी बारिश हुई। बीते 24 घंटों में हर्षिल में केवल 9 मिमी और भटवारी में 11 मिमी बारिश हुई। बारिश का यह आंकड़ा बादल फटने से आने वाली बाढ़ के स्तर से काफी कम है। आईएमडी के क्षेत्रीय मौसम विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक रोहित थपलियाल का कहना है कि प्रभावित क्षेत्र में 24 घंटों में बहुत हल्की बारिश ही दर्ज की गई। सबसे अधिक बारिश जिला मुख्यालय में मात्र 27 मिमी दर्ज की गई।

एक अन्य वरिष्ठ वैज्ञानिक का कहना है कि हर्षिल क्षेत्र में बारिश की इतनी कम मात्रा ऐसी त्रासदी लाने के लिए अपर्याप्त है। यह तबाही ग्लेशियर या झील फटने जीएलओएफ (GLOF, Glacial Lake Outburst Flood) जैसी घटना का संकेत देती है। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट के मुताबिक, उपग्रह की तस्वीरों ने त्रासदी के स्थल के ठीक ऊपर ग्लेशियरों और कम से कम दो झीलों की मौजूदगी की तस्दीक की है। एक विशेषज्ञ ने कहा कि खीरगंगा धारा के ऊपर एक ग्लेशियर है।

ऐसे में हिमनद झील फटने या ग्लेशियर के फटने से भी ऐसी तबाही संभव है। विशेषज्ञ ने कहा कि फरवरी 2021 में चमोली के रैनी में हिमस्खलन की वजह से बाढ़ आई थी। इससे ऋषिगंगा जलविद्युत परियोजना तबाह हो गई थी। सैलाब में तपोवन-विष्णुगाड बिजली संयंत्र को गंभीर नुकसान पहुंचा था और त्रासदी में 200 से अधिक लोगों मारे गए थे। उल्लेखनीय है कि केदारनाथ में भी झील फटने के बाद विनाशकारी जलजला आया था।

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