WHO से अमेरिका की विदाई: 2,380 करोड़ रुपये का बकाया कर्ज चुकाए बिना ही किया किनारा, ट्रंप का एलान – नहीं देंगे एक पैसा

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अमेरिका आधिकारिक तौर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से बाहर हो गया है। अमेरिकी स्वास्थ्य एवं मानव सेवा विभाग (HHS) ने कहा कि WHO को दी जाने वाली सभी धनराशि बंद कर दी गई है और अमेरिकी कर्मचारियों को इसके मुख्यालय और दुनिया भर के कार्यालयों से वापस बुला लिया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल के पहले ही दिन WHO से बाहर निकलने वाले कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए थे।

ब्लूमबर्ग और रॉयटर्स के अनुसार,अमेरिका पर WHO का 2, 380 करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज भी बकाया है। अमेरिका ने इसे चुकाने से मना कर दिया है। ट्रंप प्रशासन का कहना है कहा कि वे कोई भुगतान नहीं करेंगे, क्योंकि WHO को पहले ही जरूरत से ज्यादा दे चुके हैं। HHS के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पत्रकारों को बताया कि WHO छोड़ने से पहले अमेरिका के लिए कर्ज का भुगतान करना कोई वैधानिक जरूरत नहीं है।

WHO का सबसे बड़ा दानदाता था अमेरिका

अमेरिका WHO का सबसे बड़ा दानदाता था। ब्लूमबर्ग के अनुसार, 2022 और 2023 के बीच अमेरिका ने इस संगठन को लगभग 1,200 करोड़ रुपये दिए थे। दरअसल, WHO को 2 तरीकों से राशि मिलती है। पहला- सदस्य देशों से अनिवार्य योगदान और दूसरा- देशों और संगठनों से मिला दान। अनिवार्य योगदान का करीब 22 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका से आता था। वहीं, 2023 में WHO को मिले स्वैच्छिक योगदान का 13 प्रतिशत अमेरिका ने दिया था।

अमेरिका ने क्यों छोड़ा WHO?

जनवरी, 2025 में ट्रंप ने WHO छोड़ने के कार्यकारी आदेश में तर्क दिया था कि WHO अनुचित रूप से भारी फंडिंग की मांग कर रहा है, जो दूसरे देशों की तय राशि के मुकाबले बहुत ज्यादा है। इसके अलावा कोविड-19 महामारी को ठीक से न संभालना और आवश्यक सुधारों को अपनाने में विफलता जैसी वजहें भी बताई गई थीं। अमेरिकी विदेश विभाग के एक अधिकारी ने कहा, “WHO बीमारियों को रोकने, संभालने और जानकारी साझा करने में नाकाम रहा है।”

अमेरिका के इस कदम का क्या होगा असर?

इस फैसले से दुनियाभर के स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर असर पड़ेगा। WHO कई देशों में टीकाकरण से लेकर टीबी उन्मूलन समेत कई कार्यक्रम चलाता है। अमेरिकी फंडिंग बंद होने से WHO को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। संगठन ने अपनी प्रंबधन टीम में आधे कर्मचारियों की छंटनी की है और कई कार्यक्रम बंद कर दिए हैं। WHO का कहना है कि इस साल उसे अपने करीब एक चौथाई कर्मचारियों की संख्या कम करनी पड़ सकती है।]

1 साल में 70 संस्थाओं से अलग हुए ट्रंप

यह फैसला ट्रंप प्रशासन की बड़ी नीति का हिस्सा है। दूसरे कार्यकाल के पहले साल में अमेरिका लगभग 70 अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और समझौतों से अलग हो चुका है। इनमें 31 UN से जुड़ी संस्थाएं, जिनमें आर्थिक और सामाजिक मामलों का विभाग, अफ्रीका, एशिया, लैटिन अमेरिका और पश्चिम एशिया के लिए आर्थिक आयोग, अंतर्राष्ट्रीय कानून आयोग, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार केंद्र, पीसबिल्डिंग कमीशन और फंड, UN वुमेन, UNFCCC, UN पॉपुलेशन फंड, UN वॉटर, UN यूनिवर्सिटी समेत कई संस्थाएं शामिल हैं।

35 गैर-यूएन संगठन और पेरिस जलवायु समझौतों से भी अमेरिका अलग हुआ है। इनमें इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC), इंटरनेशनल रिन्यूएबल एनर्जी एजेंसी, इंटरनेशनल सोलर अलायंस, इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेच, और ग्लोबल फोरम ऑन माइग्रेशन एंड डेवलपमेंट समेत कई इकाई शामिल हैं। सरकार का कहना है कि ये संस्थाएं ‘वोक एजेंडा’ को बढ़ावा देती हैं, जो अमेरिकी हितों के खिलाफ है। हालांकि, अमेरिका संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) और UNHCR में बना रहेगा, क्योंकि इन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा और मानवीय मदद के लिए जरूरी माना गया है।

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