ईरान पर हमले की धमकी: ट्रंप के पास क्या हैं विकल्प?

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तेहरान, ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनों पर हो रहे खूनी दमन ने वैश्विक स्तर पर तनाव पैदा कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई को लेकर ईरान को सैन्य कार्रवाई की कड़ी चेतावनी दी है। हालांकि, ट्रंप ने अभी भी बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं किए हैं, लेकिन खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ‘आर्मडा’ (नौसैनिक बेड़े) की मौजूदगी एक अलग ही कहानी बयां कर रही है। यदि ट्रंप अंततः सैन्य हमले का आदेश देते हैं, तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि इस हस्तक्षेप का स्वरूप क्या हो? विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के पास तीन मुख्य रणनीतियां हैं।

1. ऊर्जा की नाकाबंदी: ‘वेनेजुएला मॉडल’ का दोहराव

ट्रंप की अब तक की सतर्कता को देखते हुए कई विश्लेषक इसे ‘वेनेजुएला दबाव परिदृश्य’ के रूप में देख रहे हैं। जनवरी की शुरुआत में जिस तरह वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को सत्ता से बेदखल कर अमेरिकी प्रभाव का विस्तार किया गया, ठीक वैसी ही रणनीति ईरान पर भी लागू की जा सकती है।

एएफपी की रिपोर्ट के मुताबिक, जेनेवा ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट के शोधकर्ता फरजान साबित के अनुसार, अमेरिका ईरान के ऊर्जा बुनियादी ढांचे को निशाना बनाकर उसके तेल निर्यात को पूरी तरह ठप कर सकता है। विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन और उसके साथ तैनात तीन विध्वंसक ईरानी तेल ले जाने वाले ‘डार्क फ्लीट’ जहाजों को रोक सकते हैं। यह एक बड़ा दबाव होगा जो हफ्तों या महीनों तक चल सकता है ताकि ईरान की अर्थव्यवस्था को अंदर से खोखला किया जा सके।

2. IRGC और सैन्य ठिकानों पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’

यदि अमेरिका सीधे सैन्य हमले का रास्ता चुनता है तो उसका प्राथमिक लक्ष्य इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) और उसकी बसीज (Basij) मिलिशिया होगी। इन समूहों पर ईरान में प्रदर्शनकारियों के कत्लेआम का आरोप है जिसमें हजारों लोग मारे जा चुके हैं।

स्वतंत्र सैन्य शोधकर्ता ईवा जे. कुलौरियोटिस का कहना है कि इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद की मदद से अमेरिका के पास इन बलों के ठिकानों की सटीक जानकारी है। टोमाहॉक मिसाइलों और लड़ाकू विमानों के जरिए उन कमांड सेंटरों को नष्ट किया जा सकता है जो प्रदर्शनों को कुचलने में शामिल हैं। यह हमला ईरान के लिए एक कठोर लेकिन नपा-तुला संदेश होगा।

3. पूर्ण युद्ध और ‘सत्ता परिवर्तन’ की रणनीति

सबसे चरम विकल्प ईरान की धर्मशास्त्रीय प्रणाली को ही उखाड़ फेंकने का है। 1979 की क्रांति के बाद से ही अमेरिका और ईरान के संबंध शत्रुतापूर्ण रहे हैं। अयातुल्ला अली खामेनेई के नेतृत्व में यह व्यवस्था दशकों के प्रतिबंधों और विद्रोहों के बावजूद टिकी हुई है।

अटलांटिक मिडिल ईस्ट फोरम (AMEF) के सह-संस्थापक डेविड खल्फा के मुताबिक, अमेरिका का उद्देश्य शासन को अस्थिर करना हो सकता है। इसमें खामेनेई, उनके करीबी सलाहकारों और वरिष्ठ जनरलों को शारीरिक रूप से खत्म करना शामिल हो सकता है ताकि चैन ऑफ कमांड को पूरी तरह से पंगु बनाया जा सके। कतर और यूएई में तैनात दर्जनों अमेरिकी लड़ाकू विमान इस बड़े ऑपरेशन का हिस्सा बन सकते हैं।

एक खतरनाक मुहाने पर दुनिया

वर्तमान में, ऐसा प्रतीत होता है कि अमेरिका एक सीमित कार्रवाई के पक्ष में है। अमेरिका चाहता है कि वह ईरानी तंत्र को इतना कमजोर कर दे कि वह जवाबी कार्रवाई करने की स्थिति में न रहे, लेकिन साथ ही एक पूर्ण क्षेत्रीय युद्ध के जोखिम से भी बचना चाहता है।

ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने भी दशकों से इस तरह के हमलों की तैयारी कर रखी है, जिससे यह कार्य अमेरिका के लिए आसान नहीं होगा। अब पूरी दुनिया की नजरें ट्रंप के अगले कदम पर टिकी हैं- क्या वे कूटनीति का रास्ता चुनेंगे या खाड़ी के पानी में तैनात ‘आर्मडा’ की मिसाइलें गरजेंगी?

आर्मडा किसे कहते हैं?

आर्मडा (Armada) मुख्य रूप से युद्धपोतों के एक बड़े बेड़े या नौसैनिकों के एक संगठित समूह को कहा जाता है। यह स्पेनिश मूल का शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘सशस्त्र सेना’ या ‘नौसेना का बेड़ा’ होता है। इतिहास में ‘स्पेनिश आर्मडा’ सबसे प्रसिद्ध है, जो 16वीं शताब्दी में इंग्लैंड पर हमला करने के लिए भेजा गया जहाजों का एक विशाल बेड़ा था। वर्तमान में, जब कोई देश (जैसे अमेरिका) किसी विशेष मिशन के लिए एक साथ कई लड़ाकू विमानवाहक पोत, विध्वंसक और सहायक जहाजों को तैनात करता है, तो उसे प्रतीकात्मक रूप से ‘आर्मडा’ कहा जाता है। सरल शब्दों में, यह समुद्र में शक्ति प्रदर्शन करने वाला जहाजों का एक विशाल और शक्तिशाली बेड़ा है।

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