पश्चिम बंगाल की राजनीति में जादवपुर विश्वविद्यालय को लेकर एक बार फिर विवाद गहराता नजर आ रहा है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने विश्वविद्यालय में कथित ‘राष्ट्र-विरोधी’ गतिविधियों को लेकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा), वाम मोर्चा, जादवपुर विश्वविद्यालय और जादवपुर विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (जूटा) पर तीखा हमला बोला है।
राज्य विधानसभा के विशेष सत्र में ‘पश्चिम बंगाल विश्वविद्यालय एवं कॉलेज प्रशासन और विनियमन संशोधन विधेयक, 2026’ पर चर्चा के दौरान शुभेंदु अधिकारी ने विश्वविद्यालय के कथित वामपंथी प्रभाव को लेकर अपनी सरकार का रुख स्पष्ट किया।
उन्होंने कहा कि सरकार जादवपुर विश्वविद्यालय को ऐसा मंच नहीं बनने देगी, जहां देश या भारतीय संस्कृति के खिलाफ गतिविधियों को बढ़ावा मिले।
विधानसभा में जमकर बरसे शुभेंदु अधिकारी
विधानसभा में अपने संबोधन के दौरान शुभेंदु अधिकारी ने जादवपुर विश्वविद्यालय के वामपंथी झुकाव वाले शिक्षकों और छात्रों के एक वर्ग को निशाने पर लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि संस्थान में कुछ ऐसी गतिविधियां होती रही हैं, जिन्हें सरकार राष्ट्रहित के अनुरूप नहीं मानती।
उनका कहना था कि विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान का मूल उद्देश्य शिक्षा, शोध और नवाचार को बढ़ावा देना होना चाहिए। ऐसे संस्थानों को राजनीतिक या वैचारिक टकराव का केंद्र नहीं बनाया जाना चाहिए।
किन मुद्दों पर सरकार का जोर?
शुभेंदु अधिकारी के बयान से सरकार की प्राथमिकताओं के तौर पर कई बातें सामने आईं—
- विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक माहौल मजबूत करना।
- शिक्षण संस्थानों को राजनीतिक टकराव से दूर रखना।
- देश और भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान बनाए रखना।
- विश्वविद्यालय प्रशासन में जवाबदेही बढ़ाना।
- शिक्षा व्यवस्था में सरकार की भूमिका और निगरानी को प्रभावी बनाना।
वामपंथी संगठनों पर सीधा निशाना
शुभेंदु अधिकारी ने माकपा और वाम मोर्चा के साथ-साथ जादवपुर विश्वविद्यालय शिक्षक संघ को भी अपने निशाने पर लिया। उन्होंने विश्वविद्यालय में सक्रिय वामपंथी विचारधारा वाले शिक्षकों और छात्रों के एक वर्ग पर सवाल उठाए।
उनके बयान के बाद यह मुद्दा पश्चिम बंगाल की राजनीति में और गरमा सकता है, क्योंकि जादवपुर विश्वविद्यालय लंबे समय से राज्य में छात्र राजनीति और वैचारिक बहस का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।
संशोधन विधेयक पर भी सियासी घमासान
विधानसभा में जिस संशोधन विधेयक पर चर्चा हुई, वह राज्य के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के प्रशासन तथा विनियमन से जुड़ा है। ऐसे में विधेयक पर बहस केवल शिक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें विश्वविद्यालयों के प्रशासन, अधिकारों और राजनीतिक प्रभाव को लेकर भी व्यापक चर्चा देखने को मिली।
सरकार की ओर से यह संकेत दिया गया कि उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने की जरूरत है।
वहीं, विपक्षी दल और वामपंथी संगठन सरकार के रुख को अलग नजरिए से देख सकते हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, प्रशासनिक नियंत्रण और कैंपस में राजनीतिक गतिविधियों को लेकर बहस तेज होने की संभावना है।
जादवपुर विश्वविद्यालय क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
जादवपुर विश्वविद्यालय पश्चिम बंगाल के प्रमुख उच्च शिक्षण संस्थानों में शामिल है। शिक्षा और शोध के क्षेत्र में इसकी अपनी पहचान है। साथ ही यहां छात्र राजनीति और सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर होने वाली बहस भी लंबे समय से चर्चा में रही है।
यही वजह है कि विश्वविद्यालय से जुड़ा कोई भी राजनीतिक बयान तेजी से सुर्खियों में आ जाता है।
शुभेंदु अधिकारी के ताजा बयान ने भी इसी कारण राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। अब नजर इस बात पर होगी कि वामपंथी दल, शिक्षक संगठन और विश्वविद्यालय से जुड़े छात्र इस बयान पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं।
फिलहाल, ‘राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों’ के आरोपों को लेकर राजनीतिक टकराव बढ़ता दिखाई दे रहा है और जादवपुर विश्वविद्यालय एक बार फिर पश्चिम बंगाल की सियासत के केंद्र में आ गया है।
