नई दिल्ली में होने वाली मोदी-पुतिन मुलाकात को लेकर दुनियाभर में हलचल तेज है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के भारत दौरे को सिर्फ एक कूटनीतिक बैठक के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी के अगले चरण से जोड़कर देखा जा रहा है। रक्षा, ऊर्जा, परमाणु सहयोग, रेयर अर्थ खनिज और भुगतान व्यवस्था जैसे कई अहम मुद्दे इस बातचीत के केंद्र में रह सकते हैं।
भारत और रूस के बीच लंबे समय से रक्षा क्षेत्र में मजबूत साझेदारी रही है। अब दोनों देश केवल हथियारों की खरीद-बिक्री तक सीमित रहने के बजाय तकनीक ट्रांसफर, संयुक्त उत्पादन और रणनीतिक संसाधनों पर सहयोग बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।
BrahMos को और ताकतवर बनाने पर फोकस
मोदी-पुतिन मुलाकात में सबसे अहम मुद्दों में से एक BrahMos हो सकता है। रूस की ओर से संकेत दिए गए हैं कि दोनों देश इस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की क्षमताओं को और बढ़ाने पर चर्चा कर सकते हैं।
भारत और रूस पहले ही BrahMos के जरिए संयुक्त रक्षा उत्पादन का सफल उदाहरण पेश कर चुके हैं। अब इसकी नई क्षमताओं पर काम होने से यह मिसाइल घरेलू जरूरतों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय रक्षा बाजार में भी दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण बन सकती है।
खास बात यह है कि भारत की दिलचस्पी केवल तैयार हथियार हासिल करने में नहीं, बल्कि अत्याधुनिक तकनीक को देश में विकसित और उत्पादित करने में है।
Su-57 को लेकर भी बढ़ी दिलचस्पी
रूस का पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान Su-57 भी बातचीत के महत्वपूर्ण विषयों में शामिल हो सकता है। हालांकि तत्काल नए Sukhoi विमान खरीदने को लेकर भारतीय रक्षा अधिकारियों की ओर से स्पष्ट संकेत नहीं मिले हैं।
ऐसे में Su-57 को लेकर चर्चा का असली केंद्र विमान की सीधी खरीद के बजाय:
- तकनीक हस्तांतरण
- भारत में उत्पादन
- एयरोस्पेस तकनीक
- संयुक्त विकास
- भविष्य की लड़ाकू विमान क्षमता
जैसे मुद्दे हो सकते हैं।
यदि तकनीकी सहयोग आगे बढ़ता है, तो इसका असर भारत की लंबी अवधि की स्वदेशी रक्षा क्षमता पर पड़ सकता है।
S-400 की बाकी डिलीवरी पर भी नजर
भारत के लिए S-400 एयर डिफेंस सिस्टम भी महत्वपूर्ण मुद्दा है। भारत ने पांच S-400 स्क्वाड्रन के लिए रूस के साथ करीब 5.43 अरब डॉलर का समझौता किया था।
अब तक चार स्क्वाड्रन भारत को मिल चुके हैं, जबकि अंतिम स्क्वाड्रन की डिलीवरी नवंबर 2026 में निर्धारित बताई गई है।
ऐसे में मोदी-पुतिन मुलाकात के दौरान S-400 की शेष डिलीवरी और भविष्य में एयर डिफेंस सहयोग को लेकर भी चर्चा अहम मानी जा रही है।
असली गेमचेंजर बन सकते हैं Rare Earth Minerals
रक्षा सौदों के अलावा इस मुलाकात का सबसे दूरगामी असर Rare Earth Elements के क्षेत्र में दिखाई दे सकता है।
रेयर अर्थ खनिज आधुनिक तकनीक और रक्षा उद्योग के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। इलेक्ट्रिक वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स, पवन ऊर्जा से लेकर मिसाइल और अन्य उन्नत रक्षा प्रणालियों तक इनका इस्तेमाल होता है।
रूस ने साइबेरिया के Tomtor जैसे बड़े रेयर अर्थ भंडारों तक भारत की पहुंच की पेशकश की है। दूसरी तरफ भारत गुजरात के Ambadungar क्षेत्र में अपने रेयर अर्थ संसाधनों को विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
मार्च 2026 में GMDC और NMDC के बीच Ambadungar की रेयर अर्थ वैल्यू चेन विकसित करने के लिए रणनीतिक साझेदारी भी हुई है।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
रेयर अर्थ की उपलब्धता के बावजूद भारत के सामने बड़ी चुनौती उनकी उच्च शुद्धता वाली प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग है। रूस की मेटलर्जी और रिफाइनिंग तकनीक यहां महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
भारत सरकार ने रेयर अर्थ पर आधारित Permanent Magnet Manufacturing को बढ़ावा देने के लिए ₹7,280 करोड़ की सहायता योजना को मंजूरी दी है।
इसका उद्देश्य भारत को केवल कच्चे खनिज के स्तर पर नहीं, बल्कि पूरी वैल्यू चेन में मजबूत बनाना है।
चीन पर निर्भरता घटाने की कोशिश
रेयर अर्थ के क्षेत्र में चीन की बड़ी भूमिका को देखते हुए भारत के लिए वैकल्पिक सप्लाई चेन तैयार करना रणनीतिक जरूरत बन गया है।
रूस के साथ सहयोग भारत को:
- वैकल्पिक रेयर अर्थ सप्लाई
- प्रोसेसिंग तकनीक
- रणनीतिक खनिजों तक पहुंच
- घरेलू मैन्युफैक्चरिंग
- रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता
की दिशा में मदद कर सकता है।
यानी मोदी-पुतिन मुलाकात का असर सिर्फ रक्षा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहने वाला है।
ऊर्जा और परमाणु सहयोग भी एजेंडे में
भारत-रूस रिश्तों में ऊर्जा पहले से ही एक मजबूत आधार है। रूसी ऊर्जा की भारत को आपूर्ति लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है। इसके साथ ही दोनों देश नए परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को लेकर भी बातचीत कर रहे हैं।
परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। इसके अलावा दोनों देशों के बीच व्यापार और भुगतान व्यवस्था को आसान बनाने पर भी चर्चा जारी है।
BRICS के भीतर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की रूस की कोशिश भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।
यूक्रेन युद्ध पर भी होगी चर्चा
रक्षा और व्यापार के साथ यूक्रेन युद्ध भी मोदी-पुतिन मुलाकात का अहम हिस्सा हो सकता है।
भारत लगातार बातचीत और कूटनीति के जरिए युद्ध का समाधान निकालने की वकालत करता रहा है। रूस ने भी भारत की शांति पहल का स्वागत किया है।
भारत की स्थिति उसे रूस के साथ-साथ अमेरिका और यूरोप सहित अन्य प्रमुख शक्तियों के साथ संवाद बनाए रखने की रणनीतिक गुंजाइश देती है।
भारत का संदेश साफ—खरीदेंगे भी, बनाएंगे भी
पुतिन के दौरे से पहले भारत की रक्षा अधिग्रहण परिषद ने करीब ₹1.10 लाख करोड़ के रक्षा प्रस्तावों को सैद्धांतिक मंजूरी दी है। इनमें लगभग 98 प्रतिशत खरीद भारतीय उद्योग से करने का लक्ष्य बताया गया है।
इन प्रस्तावों में सेना के लिए CBRN वाहन, हाई मोबिलिटी वाहन, माइन लेयर्स, एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर, ट्रॉल टैंक और Sarvatra Bridge System जैसी क्षमताएं शामिल हैं।
नौसेना के लिए Arudhra Radar और Marine Gas Turbine, जबकि वायुसेना के लिए Ground-Based Multi-Purpose Jammers और अन्य उन्नत प्रणालियों से जुड़े प्रस्ताव शामिल हैं।
इससे भारत की रणनीति स्पष्ट होती है—देश विदेशी तकनीक का इस्तेमाल करना चाहता है, लेकिन लंबे समय में उत्पादन और तकनीकी क्षमता को भारत में विकसित करना भी चाहता है।
क्यों अहम है मोदी-पुतिन मुलाकात?
पूरे घटनाक्रम को देखें तो इस मुलाकात की अहमियत किसी एक हथियार सौदे से कहीं ज्यादा है।
भारत-रूस संबंध अब धीरे-धीरे एक ऐसे व्यापक रणनीतिक सहयोग की तरफ बढ़ रहे हैं, जिसमें शामिल हैं:
रक्षा खरीद → संयुक्त उत्पादन → तकनीक हस्तांतरण → रणनीतिक खनिज → ऊर्जा → परमाणु सहयोग → वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था
भारत के लिए इसका सबसे बड़ा फायदा रणनीतिक स्वायत्तता हो सकता है। रूस से रक्षा तकनीक और ऊर्जा, भारत में उत्पादन, रेयर अर्थ की वैकल्पिक सप्लाई और घरेलू रक्षा उद्योग का विस्तार—ये सभी मिलकर भारत को किसी एक वैश्विक शक्ति या सप्लाई चेन पर अत्यधिक निर्भर होने से बचा सकते हैं।
हालांकि पश्चिमी प्रतिबंध, वित्तीय लेनदेन की जटिलताएं, तकनीकी चुनौतियां और बदलते वैश्विक समीकरण इस साझेदारी के सामने जोखिम भी पैदा करते हैं।
फिर भी अगर BrahMos की नई क्षमताओं, Su-57 तकनीक, S-400 की अंतिम डिलीवरी, परमाणु ऊर्जा और रेयर अर्थ सहयोग पर ठोस प्रगति होती है, तो मोदी-पुतिन मुलाकात भारत-रूस संबंधों के लिए एक नए रणनीतिक अध्याय की शुरुआत साबित हो सकती है।
