असम चुनाव में 40 सीटों पर भाजपा की पूरी उम्मीद: ‘असमिया पहचान’ को लेकर जुटी पार्टी, PM मोदी की सक्रियता

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असम विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार ने जोर पकड़ लिया है और खुद पीएम नरेंद्र मोदी चाय बागान तक पहुंचे हैं। मजदूरों से संवाद करने से लेकर समाज के अलग-अलग वर्गों तक भाजपा पैठ बनाने में जुटी है ताकि हिमंत बिस्वा सरमा की लीडरशिप में पार्टी फिर से सत्ता में लौट पाए। भाजपा को तीसरी बार सत्ता में वापसी के लिए कुल 126 सीटों में से 40 पर ज्यादा भरोसा है, जो असम के ऊपरी इलाकों में हैं। पार्टी को लगता है कि इस इलाके के लोगों के बीच पहचान की राजनीति ज्यादा काम कर सकती है। इसकी वजह यह है कि यहां असम के मूल लोगों की आबादी अधिक है और यहां बाहरी लोगों की बसावट एवं बांग्लादेशी घुसपैठियों की बढ़ती संख्या चिंता का एक विषय रहे हैं।

ऐसे में भाजपा एक बार फिर से यहां मजबूती से जुटने की तैयारी में है। 2021 के आंकड़े भी भाजपा का उत्साह बढ़ाने वाले हैं। यहां की कुल 40 सीटों में से 2021 में कांग्रेस को महज 5 पर ही जीत मिली थी। इस इलाके में भाजपा सरकार ने बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकालने, जंग की जमीन मुक्त कराने समेत कई ऐसे अभियान चलाए हैं। सरकार का दावा है कि उसने डेढ़ लाख बीघा जमीन को अवैध कब्जे से मुक्त कराया है। सरकार का कहना है कि इस इलाके में अभियान चलाकर 50 हजार लोगों को बाहर किया गया है। इनके नाम वोटर लिस्ट में पाए गए थे। ऐसे में भाजपा को उम्मीद है कि पहचान की राजनीति यहां एक बार फिर से हावी रहेगी तो उसे फायदा मिलेगा।

असम में वोटर लिस्ट में भी बड़े पैमाने पर करेक्शन हुए हैं। यही नहीं भाजपा ने अपने स्तर पर भी बड़े बदलाव किए हैं और संगठन में लगातार कई परिवर्तन किए गए हैं। यहां तक कि टिकट बंटवारे में इस इलाके के 19 विधायकों को मौका नहीं मिला है और नए चेहरे उतारे गए हैं। ऐसा इसलिए ताकि विधायकों के खिलाफ पैदा हुई ऐंटी-इनकम्बैंसी की काट निकाली जा सके। ऊपरी असम के जिलों में शिवसागर, जोरहाट, डिब्रूगढ़, धेमाजी, गोलाघाट, लखीमपुर, तिनसुकिया और बिस्वनाथ शामिल हैं।

घोषणापत्र से भाजपा ने साफ कर दिए हैं इरादे

कांग्रेस ने इस बार अपनी तैयारी को मजबूत करने के लिए सीपीएम, सीपीआई, भाकपा-माले, असम जातीय परिषद जैसे दलों के साथ गठबंधन किया है। रायजोर दल को भी कांग्रेस ने साथ लिया है। उसे लगता है कि स्थानीय दलों को साथ लेने से हर वर्ग को साधा जा सकेगा। हालांकि भाजपा की ओर से ‘असमिया पहचान’ को मुद्दा बनाया जाना उसके लिए फिर से ट्रंप कार्ड साबित हो सकता है। उसने यूसीसी लागू करने समेत कई मसलों को उठाकर घोषणा पत्र से भी अपने इरादे साफ कर दिए हैं।

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