ट्रांसफर आदेश हवा-हवाई? भोपाल में पुलिसकर्मी जमे, अधिकारी परेशान

प्रादेशिक मुख्य समाचार

भोपाल। आला अधिकारियों के फरमान पुलिस महकमे में किस तरह हवा में उड़ा दिए जाते हैं, इसका नमूना राजधानी के पुलिस थानों में देखा जा सकता है। जहां अधिकारियों के हस्ताक्षर से जारी ट्रांसफर आदेश थानों तक पहुंचते ही अपनी वैधानिक हैसियत खो देते हैं। हालात यह हैं कि तबादला होने के बावजूद पुलिसकर्मी महीनों तक न पुराने थानों से रवानगी लेते हैं और न ही नई पदस्थापना पर आमद दर्ज कराते हैं।

इस खुली नाफरमानी ने पूरे ट्रांसफर सिस्टम को सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया है। राजधानी के कई थानों में ऐसे आरक्षक, प्रधान आरक्षक और यहां तक कि उप निरीक्षक (एसआई) तक तैनात हैं, जिनका तबादला छह महीने से लेकर एक साल पहले हो चुका है। कागजों में वे कहीं और पदस्थ बताए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि वे अब भी उन्हीं थानों में आराम से जमे हुए हैं। न किसी को आदेश की चिंता है, न कार्रवाई का डर।

भोपाल कमिश्नरेट में यूं तो ट्रांसफर आदेश की अवहेलना आम हो चुकी है, लेकिन जब मुख्यालय डीसीपी श्रद्धा तिवारी द्वारा 2024 में निकाले गए आदेश का अमल नहीं हुआ और उन्हें संबंधित पुलिसकर्मियों को थाने से हटाने के लिए दोबारा आदेश जारी करना पड़ा तो एक बार फिर पूरी ट्रांसफर प्रक्रिया की तस्वीर सामने आई। जून 2024 में जहांगीराबाद और बजरिया थाने से एसआई राजकुमार गौतम और उमेश मिश्रा का ट्रांसफर पिपलानी थाने में किया गया था।

साथ ही एसआई संगीता काजले को कोलार से शाहपुरा थाने भेजा था। लेकिन दिसंबर 2025 तक उन्हें थानों से रवानगी ही नहीं दी गई। लिहाजा दोबारा आदेश निकालने पड़े। इसके अलावा अगस्त 2024 में ही जहांगीराबाद से पिपलानी थाने में ट्रांसफर किए गए प्रधान आरक्षक आनंद चौहान अब तक जहांगीराबाद में ही जमे हुए हैं।

वहीं हबीबगंज में पदस्थ हवलदार ओमप्रकाश पाठक, कोहेफिजा के विष्णु प्रताप सिंह और बैरागढ़ के विवेक शर्मा को भी पिछले महीनों में ट्रांसफर किया गया था, लेकिन अब तक वे भी पुराने थानों में जमा हैं। इसके अलावा निशातपुरा थाने से ट्रांसफर हुए यासीन और सितंबर में लाइन से बजरिया भेजे गए शब्बीर खान ने अब तक बजरिया थाने में आमद नहीं दी है।

अनुशासहीनता पर आला अधिकारियों की नरमी से यह साबित हो रहा है कि भोपाल पुलिस में तबादला आदेश अब बाध्यकारी नहीं, बल्कि सुविधानुसार अपनाया जाने वाला विकल्प बनता जा रहा है। जिन पुलिसकर्मियों को नई पोस्टिंग पसंद आती है, वे तुरंत आमद दे देते हैं। लेकिन जहां प्रभाव कम हो, संसाधन सीमित हों या काम ज्यादा हो, वहां आदेश को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। कई मामलों में पुलिसकर्मी महीनों तक लाइन या फिर एक थाने से दूसरे थाने तक नहीं जाते। इस पर न कोई नोटिस, न कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई होती है। इससे यह संदेश साफ जाता है कि आदेश मानना मजबूरी नहीं, बल्कि सुविधा का मामला है।

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