आगरा। उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में अक्सर अधूरी व्यवस्थाओं और संसाधनों की कमी की खबरें सामने आती रहती हैं, लेकिन आगरा के एक सरकारी अस्पताल में हाल ही में हुई घटना ने इंसानियत, साहस और कर्तव्यनिष्ठा की एक नई मिसाल पेश की है। अस्पताल में अचानक ऑक्सीजन सप्लाई फेल हो गई, और वार्ड में एक नवजात शिशु जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा था।
डॉक्टर सुलेखा चौधरी का साहस
जब सभी मशीनें काम करना बंद कर गईं और नवजात की सांसें थमने लगीं, तब ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर सुलेखा चौधरी ने न केवल स्थिति को गंभीरता से लिया, बल्कि तुरंत नवजात को मुंह से ऑक्सीजन देना शुरू किया। लगभग सात मिनट तक उन्होंने अपनी सांसें खर्च कर बच्चे की जान बचाई। इस असाधारण प्रयास के कारण नवजात शिशु की जान सुरक्षित रही और वार्ड में मौजूद अन्य स्टाफ भी राहत की सांस ले सके।
इंसानियत और कर्तव्य का प्रतीक
डॉक्टर सुलेखा का यह कदम केवल चिकित्सा कौशल का उदाहरण नहीं है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और कर्तव्यपरायणता की पराकाष्ठा भी है। जब अक्सर सरकारी अस्पतालों में संसाधनों की कमी और तकनीकी नाकामियों पर सवाल उठते हैं, यह घटना दिखाती है कि कुछ लोग अपने पेशे को सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम मानते हैं।
अस्पताल प्रशासन पर सवाल
इस घटना ने अस्पताल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकारी अस्पताल में ऑक्सीजन जैसी बुनियादी सुविधा का फेल होना किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं है। यदि डॉक्टर सुलेखा समय पर हस्तक्षेप नहीं करतीं, तो न केवल नवजात की जान पर संकट आता, बल्कि पूरे अस्पताल की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठते।
देशभर में सराहना
डॉक्टर सुलेखा चौधरी के साहस और तत्परता की खबर सोशल मीडिया और मीडिया प्लेटफॉर्म पर फैल चुकी है। लोग उन्हें केवल डॉक्टर नहीं बल्कि साहस, करुणा और कर्तव्य का जीवंत उदाहरण मान रहे हैं। उनके इस अद्भुत प्रयास ने यह साबित कर दिया कि संकट के समय इंसानियत और पेशेवर जिम्मेदारी कितनी महत्वपूर्ण होती है। इस घटना से आने वाली पीढ़ियों को यह सीख मिलती है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, संवेदनशीलता, तत्परता और कर्तव्यनिष्ठा से किसी की जान बचाई जा सकती है। डॉक्टर सुलेखा का यह कार्य मानवता की सर्वोच्च मिसाल बन गया है और हमेशा याद रखा जाएगा।
